31. मजदूरों की कोई जाति नहीं होती कहने वाले स्पृश्य नेता इसका जवाब दें - अक्तूबर 1929 परेल (मुंबई) - Page 187

170 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

भाषण के बाद उन्होंने श्री. वनमाली से विनती की कि वे आगे दिया जा रहा प्रस्ताव सभा के सामने रखें-

”समाज समता संघ और भारतीय बहिष्कृत समाज सेवा संघ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई इस सार्वजनिक सभा, पुणे के बहिष्कृत हिंदुओं द्वारा अपने न्यायपूर्ण और मानवीय हकों के लिए छेडे़ सत्याग्रह आंदोलन को अपना पूर्ण समर्थन देती है। जिन स्पृश्य लोगों ने इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया है, उन्हें हम हृदय से धन्यवाद अर्पित करते हैं और अपने निश्चय से बिना डगमगाए अपनी सत्याग्रह की लड़ाई जारी रखने की बहिष्कृत वर्ग से अनुरोध करते हैं।“

सभा के सामने इस प्रस्ताव को रखते हुए श्री वनमाली ने बहिष्कृतों के मंदिर में प्रवेश के हक का समर्थन किया और इस बात के प्रति आश्चर्य प्रगट किया कि क्यों स्पृश्य लोग इसका विरोध कर रहे हैं।

श्री. वडवलकर ने प्रस्ताव के समर्थन में भाषण दिया। उसके बाद श्री. के. सी. ठाकरे ने प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव के अनुसार शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन करने वाले अस्पृश्यों पर हमला करने वाले स्पृश्य लोगों के प्रति धिक्कार प्रकट किया गया।

श्री. द. वि. प्रधान ने अपने भाषण में ठाकरे जी के इस प्रस्ताव का समर्थन किया।

श्री खटावकर और आचार्य के भाषणों के बाद प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुए। तीसरे प्रस्ताव के अनुसार अस्पृश्य लोगों पर हो रहा हमला खुली आंखों से देख रहे कलक्टर ने तुरंत कोई कार्रवाई नहीं की इस बारे में खेद प्रगट किया गया। इस सभा में श्री देवराव नाईक, भुस्कुटे आदि के भी भाषण हुए। जुल्मी सŸा के खिलाफ जिन पर जुल्म होते हैं, उन्हें सत्याग्रह करने का अधिकार होता ही है। इसीलिए उस अधिकार का प्रयोग करने की सलाह डॉ. अम्बेडकर ने बहिष्कृतों को दिया। लेकिन यहां मिल मजदूर युनियन का मालिकों के खिलाफ जो आंदोलन छिड़ा हुआ था, उसका डॉ. अम्बेडकर ने क्यों विरोध किया? यह सवाल सभा की शुरुआत में किसी ने पूछा था, तब उसे उन्होंने आश्वासन दिया था कि सभा का कामकाज पूरा होने से पहले उसे इस प्रश्न का उŸार दिया जाएगा। उसके सवाल का जवाब देते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा,

”मिल मजदूर युनियन के आंदोलन का हमने क्यों विरोध किया, यह पूछने वालां को शायद इस बात की खबर नहीं कि पिछली मिलों के बंद के पीछे क्या कारण थे? और उस समय हालात कैसे थे? पहली बात तो यह कि यह सार्वजनिक हड़ताल नहीं थी। मिलों में काम करने वाले मुसलमान मजदूरों में से कोई भी इस हड़ताल में