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शामिल नहीं था। जिन इलाकों की मिलों में मुसलमान मजदूरों की संख्या अधिक थीं, वे मिलें बाकायदा धड़ल्ले से चल रही थीं। इसी प्रकार हड़ताल से एक दिन पहले मिल मदजूर यूनियन के अध्यक्ष, सचिव तथा अन्य दो लोग मुझसे मिलने आ पहुंचे। उस समय मेरे साथ वहां श्री देवराव नाईक और श्री. द. वि. प्रधान भी उपस्थित थे। काफी विचार-विमर्श हुआ। मैंने मिल मजदूर संघ के लोगों से कहा कि हड़ताल के लिए योग्य कारणों के अभाव में तथा धन का पुख्ता इंतजाम नहीं होते हुए हड़ताल पुकारना मूर्खता है। मैंने उनसे कहा कि, हड़ताल पुकारने योग्य कारण हों और उससे हम बहिष्कृत वर्ग का कुछ फायदा होने वाला हो, तो मैं बड़ी खुशी से हड़ताल का समर्थन करूंगा और उसमें शामिल भी होऊंगा।
उसके बाद मैंने जब हड़ताल के सभी कारणों के बारे में जांच की तो मुझे यकीन हुआ कि कुछ लोग अपनी दबंगई के बल पर हड़ताल को जारी रखना चाहते हैं। यूनियन द्वारा दिए गए वचनों पर अगर यूनियन को चलाने वाले अमल नहीं करेंगे तो उस यूनियन के शब्दों की, उनकी बातों की क्या कीमत रहेगी, यह सोचने लायक स्थितियां थीं। मुंबई सरकार द्वारा नियुक्त हड़ताल पूछताछ कोर्ट के सामने गवाही देते हुए इसी यूनियन के अधिकारियों ने अपना संगठन बिखर गया है, इसीलिए हड़ताल पुकारने की बात धड़ल्ले से कही है, यह बात सबको ध्यान में रखनी चाहिए।
तीसरी प्रमुख वजह यह है कि अब तक जो-जो भी हड़ताल हुए उनमें बहिष्कृतों को कोई न्याय नहीं मिला है। कपड़ा विभाग में उन पर लगाई गई पाबंदी अब तक कायम है। जहां तक संभव हो कपड़ा विभाग बहिष्कृतों के लिए भी खुल जाए और मुंबई के लोगों को कपड़ों का काम आए, इसके लिए यह विरोध किया गया। क्योंकि यहां के स्पृश्य लोग उन्हें काम सिखाने के लिए तैयार नहीं हैं। इसीलिए वर्हाड से 130 लोगों को लाया गया। लेकिन कपड़ा विभाग के स्पृश्य मजदूरों ने अस्पृश्य मजदूरों के साथ मिल कर काम करने से इनकार करते हुए जगह-जगह हड़ताल की घोषणाएं कीं, जिसकी वजह से लाए गए अस्पृश्य मजदूरों को लौट जाना पड़ा। अस्पृश्यों के साथ जुल्म करना ही मजदूर आंदोलन का न्याय हो तो जो नेता हमेशा यह चिल्लाते फिरते हैं कि मजदूरों की कोई जाति नहीं होती, वे इस बात का जवाब दें।
इसी प्रकार मिल का कोई भी बड़ा पद अस्पृश्य लोगों को नहीं दिया जाता। क्योंकि जाति मानने वाले स्पृश्य मजदूर अस्पृश्य अधिकारी के और मुकादम के मातहत काम करना पसंद नहीं करते। मिल में नल पर होने वाली झड़पें और स्पृश्य महिलाओं द्वारा अस्पृश्य महिलाओं की अवमानना रोजमर्रा की बातें हैं। जिस आंदोलन में अस्पृश्यों पर जुल्म ढाए जाते हैं और उन्हें बरकरार रखने की ओर झुकाव होता है, ऐसे हर आंदोलन का विरोध करना यह हमारा कर्त्तव्य है।