32
धारवाड़ जिले बहिष्कृतों की पहली परिषद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की अध्यक्षता
में धारवाड में दिनांक 28 दिसंबर, 1929 के दिन शाम को किले के अब तक बुलंद
खड़ी सीमा के पास वाले विशाल मैदान में बडे़ उत्साह के साथ हो रही थी। इस
सभा में हिस्सा लेने के लिए पूरे जिले से अस्पृश्य प्रतिनिधि के तौर पर महार, मांग,
चमार, भंगी, ढोर आदि हजारों की संख्या में लोग आए थे। अस्पृश्यों के अलावा
स्पृश्य लोग भी बडी संख्या में उपस्थित थे। मंच पर मैसूर की श्रीमती कनकलक्ष्मी
अम्मा, श्री मुदवेडू कृष्णरायप्पा बैठे थे। स्पृश्यों में डॉ. किर्लोस्कर, डॉ. कमलापूर आदि
कई गण्यमान्य लोग दिखाई दे रहे थे। रिवाज के अनुसार स्वागत के गीत गाने बाद
स्वागताध्यक्ष वाय. बी. सांबाणी जी का छोटा सा भाषण हुआ।
उसके बाद यहां धारवाड़ के कर्नाटक कॉलेज के अस्पृश्य छात्र मि. एस एन
माने ने मराठी में प्रस्ताव रखा कि सभा का अध्यक्ष स्थान डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर
स्वीकारें। उसके प्रस्ताव का सचिव मि. सबाणी ने कन्नड भाषा में समर्थन किया।
रावसाहब पापण्णा जालिहाल, बेलगांव के द्वारा किए गए समर्थन के बाद तालियों की
गड़गड़ाहट के बीच अध्यक्ष अपनी जगह पर आसीन हुए। अध्यक्ष के भाषण से पहले
सचिव ने परिषद के लिए अन्य स्थानों से आए संदेश पढ़ कर सुनाए। मि. राजभोज,
पुणे, मि. स्टार्ट, नासिक, देश भक्त गंगाधरराव देशपांडे, हुबली (बेलगांव), नामदार
जाधव, सुभेदार घाडगे, डी. सी. मिशन, पुणे आदि के संदेश पढ़ने के बाद अध्यक्ष का
भाषण हुआ। वह मराठी में ही हुआ। डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में कहा,
की जा रही प्रशंसा के लिए मैं खुद योग्य हूं अथवा नहीं इसका फैसला अपने
आप करना असंभव है। प्रशंसा करना या नहीं करना पूरी तरह श्रोताओं पर ही
निर्भर है। मैं जब विलायत से लौटा तब मानपत्र देने के लिए लोगों ने बहुत प्रयास
किया। लेकिन किसी भी आग्रह के सामने घुटने टेके बिना मैंने मानपत्र लेने से
इनकार किया। मेरे हिसाब से इसका कारण बिल्कुल स्पष्ट है। केवल शिक्षा पाकर
योग्यता आ जाती है, ऐसा मुझे नहीं लगता। दूसरी बात, आदमी विद्वान हो तो ऐसा
नहीं कि वह समाज के लिए उपयोगी ही साबित होगा। विद्वान आदमी बदमाश,
धोखेबाज, उधार लेने वाला, जुगत लड़ाने वाला और अन्य भी बुरे गुणों से परिपूर्ण
हो सकता है। आज के हालात में विद्वान, पढे-लिखे, सुधरे हुए ये लोग अस्पृश्यों के
* ज्ञानप्रकाश : 1 जनवरी, 1930