174 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
साथ कैसे बर्ताव करते हैं, यह हम देख ही रहे हैं। लेकिन यह सब ऐसे ही चलेगा, क्योंकि स्पृश्या स्पृश्य भेद कालातीत है। आज कोई भी सीना ठोंक (तान) कर यह नहीं बता सकता कि यह भेदभाव कब मिटेगा। अस्पृश्यता निवारण के कई मार्ग हैं। उनमें से एक महत्वपूर्ण मार्ग है राजनीतिक सŸा अपने हाथ में आना। आपमें सुधार लाने के लिए आजकल आपके आसपास कई स्पृश्य लोग घूमने-फिरने लगे हैं। साहब लोग भी हमारे बारे में बहुत चिंता दिखाते हैं। फिर धीमे से कहते हैं कि अपना रहन-सहन सुधारो, साफ-सुथरे रहे, नया नजरिया अपनाइए। ऐसा नहीं कि ये बातें ठीक नहीं हैं, ठीक ही हैं वे सब बातें। लेकिन ध्यान रखें कि ये सभी बातें राजनीतिक सŸा के अधीन हैं।
राजनीतिक सŸा हमारे हाथ आए तो फिर सब ठीक हो जाएगा। राजनीतिक सŸा के अभाव में जो भी कुछ हो रहा है, वह केवल सुधार हैं और राजनीतिक सŸा मिलने तक ऐसे सुधार होते ही रहेंगे, किन्तु वे कभी पूरे नहीं होंगे। हाल ही में स्टार्ट कमेटी पर जाने का मौका मुझे मिला और जिन्हें ”जंगली लोग“ माना जाता है उनसे मिलने का मौका मुझे मिला। उनमें और हममें फर्क केवल वस्त्रों का, बाह्य फर्क ही है। कोई कितना भी बताएं, ये लोग अपना पहनावा कभी नहीं बदलेंगे। आज उनके इस तरह के पहनावे के कारण ही वे बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं। इन लोगों में पहनावे के कारण तो कोई सुधार नहीं आने वाला है। सो, सुधार वगैरह में परिवर्तन कर किए गए बदलाव बस बाह्यात्कारी होते हैं, समूचे सुधार की दृष्टि से बडे़ कमजोर होते हैं ऐसे बदलाव।
जंगली लोग और हिंदु समाज तथा अस्पृश्य समाज में बहुत फर्क दिखाई देता है। इन सभी के रीति-रिवाज अलग-अलग हैं। सरकार के पास अस्पृश्योद्धार के बारे में कानून बनाने की हिम्मत नहीं है। अन्य जातियों का गुस्सा, रोष, असंतोष अपने ऊपर लेना नहीं चाहती सरकार। राजनीतिक सŸा का कुछ अंश हमारे हाथ में आए बगैर हमारे सुधारों में ताकत नहीं आएगी, जोर नहीं लगेगा। राजनीतिक सŸा को हाथ में लेने की हमें कोशिश करनी चाहिए। उसी तरह ऊंचे वर्ग द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों को दूर करने की कोशिश भी की जानी चाहिए। धक्कमपेल चारों तरफ से करनी है। कोंकण में अस्पृश्यों की जो भी स्थिति है, वह केवल गांव वालों पर ही निर्भर है। गाँव के पाटील अस्पृश्यों के अनुकूल होने चाहिए। पाटील अगर नाराज हुआ तो वह और गुंडे दोनों मिल कर अस्पृश्यों की जान हलकान कर देते हैं, जीना मुश्किल कर देते हैं। उन पर कड़ा सामाजिक बहिष्कार डाला जाता है। अपने गांव में वे यह सब कर सकते हैं। इस तरह से बहिष्कृत होने से, अस्पृश्यों को डर लगता है। जाहिर है कि वे इस तरह के समान अधिकार प्राप्त करने वाले