32. सिर्फ शिक्षा पाने से योग्यता हासिल नहीं होती - दिसंबर 1929 धारवाड़ - Page 192

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आंदोलनों से दूर रहते हैं। अस्पृश्यों की हालत आज भी बड़ी विचित्र है।

इस अंग्रेजी राज्य में तो अस्पृश्यों पर होने वाले सामाजिक बहिष्कार और अत्याचारों को दूर करने वाला कानून तो नहीं ही बनेगा। अब मेरी पक्की राय बनी है कि हमें स्वराज्यवादी ही होना चाहिए। इस देष में कम से कम महार, मांग, चमार को आजादी चाहिए। आजकल जो स्वराज की कोशिशें चल रही हैं, उनसे तो जो हासिल होगा, वह भी औरों को ही होगा। अब जो स्वराज का संविधान बनाया जा रहा है उसमें हम जरूरतमंदों को भी हिस्सा मिलना चाहिए। हालांकि, स्वराज के इस बहस, लेन-देन वाद-विवाद से कुछ काम का निकल आएगा, उसमें कुछ दम है ऐसा मुझे नहीं लगता। मैं साफ बताता हूं कि अंग्रेज सरकार पर मुझे विश्वास नहीं है। हमारे भले के लिए ये सरकार कुछ नहीं करने वाली। अपना भला हमें खुद करना होगा। स्वागताध्यक्ष ने कहा कि अस्पृश्यता है तब तक स्वराज नहीं मिलता। लेकिन यह बस भूल है। अंग्रेज सरकार किसी दर्शन के सहारे नहीं चलती, वे बहुत ही व्यवहार कुशल लोग हैं। कोई मांग रहा है, तो उसे स्वराज दे देने के लिए वह यहां नहीं आई है। काटने वाले को, खसोटने वाले को वे खुश करेंगे, फिर अपने साम्राज्य की सुरक्षा देखेंगे। आपके झमेलों से उसे कुछ लेना-देना नहीं है। इस देश के सुख सम्पन्नता के लिए वे स्वराज नहीं देने वाले। फिलहाल स्वराज के बारे में बातचीत चल रही है। उसमें आपकी और हमारी कोई खोज-खबर ले रहा है क्या? वे विचार-विमर्श कर रहे हैं गांधी, सप्रू, नेहरू, जिन्ना के साथ। इन लोगों का हमसे कितना ताल्लुक है, यह तो साफ ही है। इसीलिए अब हमें स्वराजवादी होना पडे़गा। हालांकि, सिर्फ स्वराज पाकर क्या होना है? हमें भी तो स्वराज के लायक होना चाहिए। चीखेंगे-चिल्लाएंगे तो हमें सŸा मिल भी जाएगी, लेकिन ज्ञान के बिना उसे पाना व्यर्थ है। अस्पृश्यों की बहुसंख्या से कुछ नहीं होने वाला है। स्वराज को भोगने के लिए योग्यता, काबीलियत भी चाहिए। अन्य समाज से हमारी स्थिति अलग है। ऐसा जातिभेद अन्य समाज में भी है, लेकिन हममें एक विशेष, नमूना उदाहरणस्वरूप करना गुणभेद भी है।

जातिभेद और गुणभेद समानांतर हैं। आज भी वे पॅरलल हैं। अन्य किसी भी देश में इस तरह के हालात नहीं हैं। अनादिकाल से हमने आनुवंशिक गुणों को मान्य कर उसे स्वीकारा है, आज हम उसी के बुरे परिणामों को भुगत रहे हैं। अस्पृश्य कितना भी विद्वान रहे, वह दूर ही रहता है और अज्ञानी ब्राह्मण ऊंची जगहों पर विराजमान होता है। आज तक यह केवल अज्ञान के कारण ही चलता आया है। अज्ञान न होता तो समता का संग्राम कब का छिड़ चुका होता। ब्राह्मण गुण से कनिष्ठ भले हो, जन्म से श्रेष्ठ होता है।