32. सिर्फ शिक्षा पाने से योग्यता हासिल नहीं होती - दिसंबर 1929 धारवाड़ - Page 193

176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

गुणभेदों में यह जो खाई है, उसे पाट दिया जाना चाहिए। उसके लिए शिक्षा का प्रसार होना चाहिए। हमें बहुत जागृत होने की जरूरत है। अवसर सुलभ होना और उसे हासिल कर लेना, यह हम पर निर्भर है। शिक्षा के अभाव में यह संभव नहीं हो पाता है। हमें खुद अपने अधिकारों को झपट लेने की, हां मैं झपट लेने की ही बात कर रहा हूं, कोशिश करनी चाहिए।

हमारा संघर्ष इंसानियत का है। इसके लिए आखिर हमें सत्याग्रह करना पडे़गा और वह अंतिम उपाय होता है। स्वदेशी और विदेशी दोनों की तरफ से जिस प्रकार के अन्याय होंगे उनके अनुसार ही उनके विरोध के उपाय किए जाने चाहिएं। पुराणकाल में कौरवों और पांडवों के बीच इतना बड़ा युद्ध क्यों हुआ? केवल राज्य के लिए। अस्पृश्यता समग्र समाज का कल्याण होने ना देगी। वह समाज कल्याण की राह के अडंगे की तरह है। हालांकि हमें अपने स्तर में बढ़ोतरी कर सुधार लाना होगा। पक्की तरह ध्यान में रखें कि अपनी मुक्ति, प्रगति, विकास, उन्नति की लड़ाई हमें

खुद कभी ना कभी तो करनी ही होगी। स्पृश्य जनता का दुरभिमान कैसे जाएगा? वे पुराण मताभिमानी होंगे ही। आखिर में मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि आत्मनिर्भरता का मार्ग अपनाइए। आपको इसी हाल में रखने की कार्रवाई बेहद पूर्वनियोजित है। आपका वह महार की वतन, उसके अभिमान के कारण आप कितने परावलंबी हो गए हैं इसका क्या आपको कहां अहसास है? इसी महारकी वतन के कारण महार गांव में हमेशा-हमेशा के लिए कैद हो गया है।

महार यानी सरकारी भिखारी। वतनों के कारण हर गांवों को ऐसे सरकारी भिखारी मिले हैं। भिखारी बनाने वाले वतन के चक्कर में महार को बंधे नहीं रहना चाहिए, उन्हें अपने बाहुबल के सहारे संघर्ष करना होगा। शिक्षा पाने के लिए उन्हें स्वयं खुद की मदद करनी होगी। अन्य कोई उनकी मदद नहीं करेंगे। कुछ उदारमन लोग अवश्य उनकी मदद करेंगे।

लेकिन इस प्रकार उदारमन चूहों से पाई हुई मदद केवल उधारी है। महार लोग गरीब होंगे लेकिन क्या वे संख्या में कम हैं? वे अपनी ही मदद लें, उसे एकत्रित करें तो शिक्षा का सवाल अपने आप हल हो जाएगा। धारवाड़ जिले में एक लाख महार लोग होंगे। हरेक अगर एक रुपए का चंदा भी देगा तो एक लाख रुपयों का फंड इकट्ठा हो जाएगा। और उसके सहारे सहजता से सौ बच्चों का बोर्डिंग चलेगा। फिलहाल यहां एक बोर्डिंग की स्थापना की गई है। सरकारी छात्रावास, आश्रम है। ठीक-ठाक, काम चलाऊ ग्राँट मिलती है। हर छात्र के पीछे दस रुपए मिलते हैं। अन्य जगहों पर मदद नहीं दी जाती। फिलहाल पंद्रह बच्चों की ही व्यवस्था हो पाई