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है। सत्य की विजय के लिए जरूरी है कि हम अपना आंदोलन जारी रखें, ऐसा कह कर उन्होंने अपना प्रास्ताविक भाषण पूरा किया। फिर विषय निर्धारक कमिटी बनाई गई और परिषद की पहले दिन की कार्रवाई खत्म हुई।
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दूसरा दिन
परिषद की कार्रवाई तीन बजे शुरू हुई। उस अवसर पर कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज की उपस्थिति से बहिष्कृत वर्ग कृतज्ञता महसूस की। उन्होंने अपने भाषण में कहा -
आज मेरे प्रिय मित्र अम्बेडकर ने इस सभा का अध्यक्ष पद स्वीकार किया है उनके भाषण का मुझे लाभ मिले इसलिए शिकार से से लौटकर तत्काल यहां आया हूं। मिस्टर अम्बेडकर सभी पिछड़ी जातियों की चिंता करते हैं। इसके लिए मैं उनका हृदय से अभिनंदन करता हूं।
असल में महार, मांग, चमार, ढोर यह सारे वैश्य जाति से सम्बन्धित हैं, विशेष कर महार लोग पहले महारकी सूत निकाल कर उसका व्यापार करते थे। उन्हें अस्पृश्य किसने बनाया कौन जाने। ऐसा वैश्यों का धंदा छोड़ कर दस्यु यानी नौकर और नौकर यानि अतिशूद्र ऐसा धंदा अम्बेडकर ने क्यों अपनाया मैं नहीं जानता। फिर भी मैं यहां इकठ्ठा सभी लोगों से अनुरोध करता हूं कि हम अपने योग्य नेता नहीं चुनते हैं इसलिए हम इस दयनीय स्थिति में पहुंचे हैं। मीठा-मीठा बोल कर नाम कमाने के लिए हममें से कुछ स्वार्थी लोग अयोग्य नेताओं को नियुक्त कर अज्ञानी लोगों को धोखा देते हैं। पशु-पक्षी भी अपनी ही जाति का नेता बनाते हैं। कोई चार पैरों वाला जानवर पक्षियों का नेता नहीं बना। जानवरों में भी कभी कोई पक्षी नेता नहीं बनाया जाता। गाय बैल और भेड़ों का नेता गडरिया होता है। इसी कारण आखिर में उन्हें बूचड़खाने जाना पड़ता है।
आज उन्हें पंडित की उपाधि देने में हर्ज भी क्या है? विद्वानों में वे एक आभूषण हैं। आर्यसमाज, बौद्धसमाज या ईसाई खुशी खुशी उन्हें अपने में शामिल कर लेते लेकिन वे वहां गए नहीं क्योंकि वे आपका उद्धार करना चाहते हैं। इसके लिए आपको उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए और मैं भी हूं। ख्1,
मेरे राज्य के बहिष्कृत प्रजाजनों, आपने अपना सच्चा नेता खोज लिया इसके लिए मैं आपका हृदय से अभिनंदन करता हूं। मेरा विश्वास है कि डॉ. अम्बेडकर आपका कल्याण करेंगे इतना ही नहीं तो एक समय ऐसा आएगा कि वे सारे हिंदुस्तान के नेता बनेंगे ऐसी मेरी मनोदेवता मुझसे कहती है। ख्2,
मूकनायक, 10 अप्रैल 1920
डॉ बाबासाहेब अम्बेडकरः धनंजय कीर, पृष्ठ 46