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(अ) कमेटी अखिल भारतीय संगठन का संविधान बना कर परिषद के अगले
अधिवेशन के सामने रखे। और
(ब) यह कमेटी परिषद की वर्किंग कमेटी के रूप में आगामी वर्ष के लिए
काम करेगी और अस्पृश्य वर्ग से जुडे़ सभी सवालोंं के बारे में और देश
की हालिया राजनीतिक स्थितियों में पैदा होने वाली समस्याओं के बारे
में सोचेगी। ख्1,
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इस अधिवेशन में दिनांक 8 अगस्त, 1930 के दिन अध्यक्ष पद से डॉ. अम्बेडकर ने जो भाषण दिया था, वह काफी महत्त्वपूर्ण था. उन्होंने अपने भाषण में कहा था -
”सज्जनों,
आज की सभा का अध्यक्ष पद स्वीकारने का आमंत्रण आपने मुझे दिया है इस बात की मुझे खुशी है। आपने यह सम्मान मुझे देने के लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं। आपने मुझ पर जो भरोसा किया है उसकी अहमियत मैं जानता हूं। हालांकि, इस भरोसे के साथ आपने जो जिम्मेदारी मुझे सौंपी है, वह बेहद कठिन है, और नितांत असामान्य स्वरूप की है, उसे मैंने यदि टालने की कोशिश की होती, तो ज्यादा समझदारी होती ऐसा मुझे अब लग रहा है। इसके बावजूद इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए अगर मैंने हामी भरी तो केवल इसलिए कि फिलहाल जो आपात समय चल रहा है उसमें अपने समाज के भाई-बहनों के हित के लिए हर किसी को अपनी शक्ति के अनुसार अपनी सेवा उपलब्ध करा देनी चाहिए, ऐसा मुझे पक्की तरह लगता है। हालांकि इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए आप लोगों से प्राप्त सहयोग और मदद में किसी तरह की कमी नहीं आएगी और यहां इकट्ठा हुए अपने समाज के नेता अपने समृद्ध अनुभव का और विचारशील निर्णय का लाभ मुझे देंगे इसका मुझे अहसास और विश्वास है और इसीलिए मैंने यह जिम्मेदारी स्वीकारी है।
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क्या भारत के लोगों का स्वशासित, एकजुट समाज बन सकता है? भारत के क्षितिज पर आज यह गंभीर समस्या का सवाल बेहद विशाल आकार धारण कर झूले-सा झूल रहा है। इस प्रश्न के समाधान के बारे में दलित समाज की क्या राय है, यह जानने के लिए ही हम आज यहां इकट्ठा हुए हैं। इस सवाल ने भारतीय
विदर्भ के दलित आंदोलन का इतिहास : हि. ल. कोसारे पृ. 148, 149, 169 और 171