190 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लोगों के बीच ही नहीं वरन् पूरे अंग्रेज राज में और पूरी दुनिया में हलचल मचा रखी है। इस सवाल के निपटारे के लिए हमारे जवाब पर ही बड़े पैमाने पर इस देश का भविष्य निर्भर करता है। भारतीय जनता के स्वयंशासित एक संघ समाज के निर्माण का हार्दिक समर्थन कर हम इसे गति प्रदान कर सकते हैं, या इसमें बाधा डाल, विरोध कर उसकी राह में रोडे़ भी अटका सकते हैं। कुल मिला कर वह हमारी ही राय पर आधारित है। इसीलिए मुझे लगता है कि यह निर्णायक मसला आप ढिलाई से सुलझा नहीं सकते। उसके सभी पहलुओं के बारे में ठीक तरह से सोच-समझ कर ही बाद में उचित निर्णय लिया जाना चाहिए। इस बात का डर अपने मन में बिल्कुल न रखें कि मेरा रुझान, मत अगर अन्यों से अलग होगा तो क्या होगा? आप बस इस बात का खयाल रखें कि, अपना निर्णय आप स्वतंत्र सोच के साथ, पूरी श्रद्धापूर्वक विवेक से, सम्यक दृष्टि से ले रहे हैं।
- इस सवाल के दो पहलू हैं, इसका आप लोगों को अहसास तो है ही। बताया जाता है कि भारत की जनता विभिन्न मानववंश से बनी हुई है। वे कहते हैं, यहां के लोग परस्पर विरोधी रूढियों एवं परंपराओं वाले, रीति-रिवाजों वाले तथा विभिन्न सिद्धांतों वाले विभिन्न धर्मों का पालन, उपासना करते हैं। वे अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं और परस्परविरोधी सामाजिक रूढि़यों के कारण तथा विभिन्न हितसंबंधों के कारण यहां की जनता में मनमुटाव और आपसी विद्वेष है। कई बार यह प्रश्न पूछा जाता है कि, इस तरह का भिन्न वंश वाले लोगों का समूह स्वयंशासित समाज के रूप में सफलता कैसे पाएगा? असल में, यह एक कठोर वास्तविकता है और इस बात को कोई भी सयाना व्यक्ति नजरंदाज नहीं कर सकता कि स्वराज पर इस बात का क्या असर होगा? हालांकि, इन कटु सत्यों को मान लेने के बाद भी उनसे क्या निष्कर्ष निकलते हैं?
सज्जनों, इस मामले में आप अपनी राय व्यक्त करें इससे पहले ऐसे ही कुछ और कटु सत्यों की ओर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं। लैटिविया, रूमानिया, लिथिआनिया, युगोस्लाविया, इस्टोनिया और झेकोस्लोवाकिया जैसे देशों में क्या स्थितियां हैं इस पर भी सोचिए। ये सारे नए राज्य हैं, ‘स्वयंशासन सिद्धांत’ की स्थापना के लिए सौगंध खाकर लडे़ गए 1914 के महायुद्ध के बाद अस्तित्व में आए हैं। इन नए-नए अस्तित्व में आए राष्ट्र स्वयंशासित, सार्वभौम, आजाद तथा अंतर्गत और बाह्य निर्णयों के बारे में सर्वश्रेष्ठ अधिकारी राष्ट्र हैं। इन राष्ट्रों की अंदरूनी सामाजिक स्थितियां कैसी हैं? सुन कर आपको शायद अचरज होगा कि भारत से अधिक नहीं सही वरन् वहां की स्थितियां भारत की स्थितियों की ही तरह बदतर हैं। लेटिविया में लेट, रशियन, ज्यू, जर्मन और अन्य लोग भी हैं। लिथिआनिया में लिथोनिअन, ज्यू, पोल, और रशियन तथा अन्य लोग भी बसे हुए हैं। युगोस्लाविया