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में सर्ब, क्रोट, स्लाव्हन रूमानियन, हंगेरियन, अल्बेनियन, जर्मन और स्लाव लोग भी रहते हैं। इस्टोनिया में इस्टोनियन, रशियन, जर्मन और अन्य छोटे-छोटे गुटों के लोग हैं। चेकोस्लोवाकिया में जेक, जर्मन, मेगयर, रुथिनियन और अन्य लोग हैं। हंगरी में मेग्यर, जर्मन ओर स्लोवाक लोग हैं। वंश और भाषा की दृष्टि से अलग-अलग होने के बावजूद इन लोगों ने अपने राष्ट्र को शक्तिशाली राष्ट्र बनाए हैं। एक राष्ट्र के निर्माण के लिए इन विभिन्न वंशों के लोगों को जोड़ने के लिए इनके पास धार्मिक एकता का सहारा भी नहीं है। इनमें चार या पांच तरह के कैथोलिक पंथीय लोग आप पाएंगे। वहां रोमन कैथोलिक, ग्रीक कैथोलिक, जेकोस्लोवाक कैथोलिक पंथों के लोग हैं। उनके साथ ही साथ वहां एवेंजेलिन, ज्यू, प्रोटेस्टंट और अन्य छोटे-छोटे पंथों के कई लोग रहते हैं। इस बारे में गंभीरता से सोचिए। इन देशों में दिखाई देने वाली मानवी दुनिया क्या भारत की मानवी दुनिया में अधिक भिन्न वंशीय लोग और क्या अधिक भिन्नता की भीड़ हैं? यकीन के साथ मैं कह सकता हूं कि, नहीं हैं। भारत के बारे में आपका निर्णय यदि ईमानदार और स्वतंत्र हो, ऐसी आपकी इच्छा तो आपको इस यथार्थ पर ध्यान देना ही होगा।
सज्जनों, इस तुलना के परिणामस्वरूप एक सवाल उभरता है कि अगर लॅटिविया, लिथिओनिया, युगोस्लाविया, इस्टोनिया, जेकोस्लोवाकिया, हंगरी, और रुमानिया इन देशों में लोग भिन्न वंश, भाषा, धर्म और संस्कृति के होने के बावजूद वे एकजुट और स्वयंशासित राष्ट्र बन कर उभर सकते हैं, निर्वाह कर सकते हैं तो भारत इस प्रकार निर्वाह क्यों नहीं कर सकता? इसका क्या कोई जवाब है? मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं है। अपने मित्रों में से यदि किसी के पास इसका सटीक जवाब हो तो मैं उसे सुनने के लिए बडा उत्सुक हूं।
- स्वराज की सुविधा प्राप्त होने से पहले ही किसी राज्य के सभी परस्पर विरोधी घटक नष्ट होकर वह राज्य एक पूरी तरह एक संघ हो जाए, इस तरह के दुराग्रह पर कायम रहना मेरी राय में वास्तविक स्थिति को उलटे क्रम में देखना है। यह एक तरह से स्वयंशासन में एक राष्ट्रीयत्व की भावना निर्माण करने की जो शक्ति है उसे पूरी तरह नजरंदाज करना ही है। एक भाषा, एक धर्म और एक संस्कृति के सूत्र में बंधे राष्ट्र इस दुनिया में बहुत कम हैं। लेकिन भिन्न धर्म, भाषा और संस्कृति से भिन्न होने वाले जनसमूह राजनीतिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक समानता के कारण एक होकर परिणामस्वरूप एकराष्ट्रीय जनता होने के कई उदाहरण मिलते हैं। ऐसे राष्ट्रों को अगर एक राष्ट्रीयत्व की कसौटी पर कसा जाता तो उन्हें कभी स्वयंशासन का ही मौका नहीं मिलता। इस बारे में जो भी कुछ बताया गया और जो कुछ किया गया उसे अगर गृहित मान लें तब भी कई राष्ट्रों को संगठित होने के लिए स्वयंशासन ही कारण बना है इस बात को भूल नहीं सकते। और वे राष्ट्र