192 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
स्वयंशासन के अभाव में पहले ही की तरह विभिन्न लोगों के समूहों के रूप में क्या
नहीं रहे होते? जर्मन साम्राज्य द्वारा स्वयंशासन का नियम स्वीकार करना ही क्या
जर्मनी के एक राष्ट्र होने का कारण नहीं बना? बवेरियन, प्रशियन, सैक्सन और
अन्य अनेक विभिन्न जनसमूह एक राष्ट्र में अंतर्भूत होकर एक शासन के तहत नहीं
आते तो क्या वे उसी स्थिति में नहीं होते जिस स्थिति में 1870 से पहले थे? विभिन्न
वंशों के जनसमूहों को एक राष्ट्र में अंतर्भूत करने के लिए एक शासन कई बार एक
उŸाम उपाय साबित हो सकता है। भारत के उदाहरण से भी क्या यही साबित नहीं
होता? आज भारत में जो थोड़ी-सी एकता की, एक राष्ट्र की भावना दिखाई देती
है वह अंग्रेजों के राज में एक सामान्य शासन के कारण ही उपजा है, क्या यह एक
सामान्य बात नहीं है? ऐतिहासिक अथवा तार्किक नजरिए से भी देखें तो मुझे लगता
है कि भारत की जनता की विभिन्नता भारत के स्वयंशासन के मार्ग में रोड़ा नहीं बन
सकती। और, अगर आपका उद्देश्य है कि भारत एकराष्ट्र बने तो इस उद्देश्य की
पूर्ति के लिए स्वराज ही सबसे महत्वपूर्ण साधन बनेगा।
- भारत में जो जनसमूह विद्यमान हैं, उनके इस भिन्नता का क्या कुछ भी
असर नहीं होने वाला हैं? स्वराज के संविधान का निर्माण करते हुए क्या हमें उसके
बारे में कुछ भी नहीं सोचना चाहिए? आप मुझसे ये सवाल पूछेंगे इस बारे में मुझे
बिल्कुल शक नहीं है। लेकिन बिना ना-नुकुर किए मैं इसका जवाब देता हूं कि,
उस पर सोचना ही होगा। इस जनसमूह की भिन्नता की स्थिति की ओर ध्यान दिए
बगैर उसकी ओर अनदेखी कर शर्तों को ठुकराकर और मर्यादा को त्यागकर भारत
की स्वतंत्रता की दंभी कोशिशें करते रहने की कांग्रेस वालों की हटेली मानसिकता
है। सज्जनों, यदि संविधान तैयार करने का सोचा तो इन हालातों में शासन की
शक्ति किसके हाथ जा सकती है? क्या आपको ऐसा लगता है कि सत्ता की बागडोर
अल्पसंख्यकों के हाथों में दी जाए? या निम्न वर्णों के हाथों में दी जाए? मुझे तो अगर
किसी बात का यकीन है तो सिर्फ इस बात का कि, भारतीय समाज की वास्तविक
स्थिति पर ध्यान न दिया जाए तो भारत के भावी स्वराज के शासन की बागडोर उच्च
शिक्षाप्राप्त, प्रतिष्ठित, अमीर और महत्वाकांक्षी लोगों के ही हाथ में चली जाएगी। यानी
कि संपिŸा, शिक्षा और सामाजिक दर्जा जिन्हें प्राप्त हैं उन सामंतों के हाथों में ये
सारे सूत्र चले जाएंगे। जीवन के अन्य क्षेत्रों की ही तरह राजनीति में भी शक्तिशाली
लोगों को ही विजय प्राप्त होती रहती है। शिक्षा और संपिŸा की शक्ति सामंतों के इस
वर्ग की सहायक बनेंगी। लेकिन अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए दुर्बल समाज
घटकों को सामंतों के गुट को सहायक होने वाली इन शक्तियों के खिलाफ लडना