33. अखंड भारत हमारा ध्येय है - अगस्त 1930 नागपुर - Page 210

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ही काफी नहीं होगा। ऊपरी तौर पर अत्यंत सूक्ष्म दिखाई देने वाली लेकिन काफी प्रभावकारी एक और शक्ति भी है जो उनके सामाजिक दर्जे में शामिल है। सामाजिक रचना के तय सांचे में योग्यता या गुणवŸा का कोई स्थान नहीं। भारत में केवल जाति को महत्व है, जाति संबंधी भावनाएं पुरजोर हैं, जो अपने से अलग जाति के लोगों से भिड़ने के लिए उकसाती रहती हैं। ज्यादातर जातियों के मन में यह भावना कार्यरत होती है इसलिए अल्पसंख्यक जातियों के लिए वे भयंकर रोडे़ पैदा करेंगे और राज्य शासन के दरवाजे उनके लिए शायद हमेशा के लिए बंद कर देंगे। ऐसी सामाजिक स्थितियों की कार्यवाही का भयंकर असर जाहिर है कि दलित वर्ग पर होगा। आपको इस बात का अहसास तो होगा ही कि हिंदू धर्म के अनुसार भारत में जातियों की रचना बढ़ते क्रम में आदर की तथा उतरते क्रम में तिरस्कारपूर्ण है। दर्जे के इस जन्मजात ठप्पे के परिणामस्वरूप निम्न जाति के लोगों के मन में उच्च जाति के उम्मीदवार को ही उचित समझने, उसे ही पसंद करने की भावना जागृत होती है। इस मानसिक स्थिति का दलित वर्ग की शासन सŸा के लिए किए जाने वाले संवैधानिक प्रयास पर बुरा असर पड़ेगा। अस्पृश्य उम्मीदवार के लिए एक भी वोट दिए बगैर स्पृश्य लोग अस्पृश्यों के कई वोट पा सकते हैं। और इसका असर ये होगा कि अस्पृश्य केवल चुनाव ही नहीं हारेंगे, वरन अनजाने ही अपने प्रतिस्पर्धियों के लिए सहायक बनेंगे। सामाजिक स्थितियों की तरफ ध्यान न देने के कारण अमीर, उच्च शिक्षित और उच्च वर्ण के लोगों का शासन सŸा में सामंतवाद स्थापित हो रहा हो तो अपने ध्येय के साथ मिलते-जुलते सभी उपायों से उस पर पाबंदी लगाना अपना कर्त्तव्य है ऐसा मुझे लगता है। क्योंकि, केवल अपने मालिक के बदल जाने पर हमें बिल्कुल संतोष नहीं कर लेना चाहिए। किसी भी देश का दूसरे देश पर साम्राज्य होना ठीक नहीं। काँग्रेस वालों की यह राय मैं मानता हूं। लेकिन मुझे भी उन्हें साफ तौर पर यह बताने की आजादी है कि उनका कथ्य यहीं पूरा नहीं होता, बल्कि यह भी सच है कि किसी भी वर्ग का दूसरे वर्ग पर आधिपत्य ठीक नहीं। यूरोपीय नौकरशाही, लालफीताशाही और स्वदेशी सामंतवाद यह शब्द संपिŸा, शिक्षा और सामाजिक दर्जे के लिए मैं इस्तेमाल कर रहा हूं। इन दोनों में से कौन जनता का अच्छा खयाल रख सकता है? स्वदेशी सामंतों का कहना है कि जनता की हालत, उसकी आदतें, उनके सोचने और जीवन जीने के तरीके, जरूरतें और शिकायतें और सुलह करने के उनके तरीकों के बारे में ज्ञान उन्हें ब्रिटिश नौकरशाहों से अधिक है। हो भी सकता है, लेकिन स्वदेशी सामंतों के मन में अन्य वर्गों के बारे में पक्षपात की भावना है, साफतौर पर दिखाई देने वाला वंशाभिमान है। अपने जातिबंधुओं के प्रति पक्षपात करने की मानसिकता है। साथ ही, आम जनता के भविष्य के बारे में तय करने वाली शासन की सŸा उनके हाथ में नहीं सौंपी जानी चाहिए, यह जो गंभीर आरोप उन पर लगाया जाता है, उससे वे सही सलामत बेगुनाह छूट सकते हैं, बरी