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आता। अपना व्यक्तित्व और अपनी प्रकृति सब साथ लेकर ही वह वोट मांगने आता हैं। सामंत वर्ग की बुद्धि देश की बहुत बड़ी संपदा है। लेकिन इस बुद्धि के सहारे उन्हें शासन का स्वयंसिद्ध अधिकार मिलना कोई जरूरी नहीं है। यह अधिकार उस व्यक्ति के चरित्र पर और बुद्धि का कैसे प्रयोग करेंगे इस बात पर आधारित होता है। हमें सिर्फ कार्यक्षमता पर ध्यान देना होगा। अॅडिसन कहता है कि, किसी की बुद्धि से समाज का किस तरह हित या अहित हो रहा है, इस बात की फिकर किए बगैर जब लोग उनकी योग्यता के बारे में आदर पालने लगें तो समाज के लिए इससे बड़ी घातक कोई और बात नहीं हो सकती। बुद्धि की इस प्राकृतिक देन का और कलात्मक योग्यता, सिद्धि का इस्तेमाल सद्गुणों के विकास के लिए हो रहा हो, तो सभ्यता को बाधा पहुंचाने वाली न हो, तो ही वह सिद्धी अमूल्य हो सकती है। हम जिनसे बातें करते हैं उनके मन का रुझान और उनकी मानसिकता का ठीक-ठीक पता चलने तक उनके बारे में अच्छी राय नहीं बना लेनी चाहिए। वरना उनके व्यक्तित्व के आकर्षण के कारण सोचने के बाद तिरस्कार करने योग्य व्यक्तियों के जाल में हम फंस सकते हैं। शासन सŸा पाने के लिए एड़ी-चोटी का पसीना एक करने वाले अमीर लोगों के चरित्र के बारे में मैंने पहले ही विवरण दिया है। इसलिए अब और कुछ बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन इन्ही अमीर-उमरावों के कारण इस देश में घट रही लज्जादायक घटनाओं को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इस देश में पांच से छह करोड़ लोग अस्पृश्यता का शाप भुगत रहे हैं। यह शाप और उनका दुख इतना भयानक है कि दुनिया में कहीं अन्यत्र इस तरह का दुख दिखाई नहीं देता। हर मानव के लिए आवश्यक मूलभूत अधिकारों से उन्हें वंचित किया गया है। समान अवसर की कमी के कारण उनकी हालत बेहद दीन-हीन हो गई है। अस्पृश्यों के अलावा इस देश में उतनी ही संख्या में आदिवासी और वन्य जनजातियों के लोग भी हैं। संस्कृति और सुधारों के उजाले में उन्हें ले आने के बजाए उन्हें पुरातन और जंगली स्थिति में छोड़ दिया गया है। स्वदेशी सामंतों द्वारा भूतकाल में जो सेवाभाव का अभाव और गैरजिम्मेदारी के ये जीते-जागते उदाहरण हैं। इन अमीर-उमरावों का बर्ताव भविष्य में पूरी तरह अलग रहेगा, इस पर भरोसा करने के लिए हमसे कहा जाता है। इस पर भरोसा करने लायक मैं भोला नहीं हूं क्योंकि आज के इस शैतान में रातों-रात बदलाव आया और वह भगवान का दूत बन गया ऐसा उदाहरण मैंने तो नहीं देखा है।
- हमसे यह भी कहा जाता है कि, देश को राजनीतिक आजादी मिलने तक सामाजिक समस्याओं को हल करना आगे टाला जाना चाहिए। कोई भी समझदार व्यक्ति इस जाल में नहीं फंस सकता। किसी दीवानखाने में प्रवेश करने से पहले हर किसी को इस बात को जांच-परख कर लेनी चाहिए कि वह कहीं पिंजड़ा तो नहीं