196 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है? हममें से हर कोई जानता हो या फिर हर किसी को जान लेना चाहिए कि साधन
संपन्न व्यक्ति साधनहीनों की अपेक्षा कहीं अधिक शक्तिशाली होता है। हममें से हर
किसी को यह पता है या फिर उसे पता कर लेना चाहिए कि जिसके हाथ में सŸा
होती है, वह सŸा से बाहर के व्यक्ति का पक्ष यदा-कदा ही लेता है और उसे सŸा
में भागीदारी भी यदा-कदा ही देता है। इसीलिए अब सामाजिक मसले हल करने से
जिनका नुकसान होने की संभावना प्रबल है, उनके हाथ में अगर आप आसानी से
सŸा दे देंगे तो सामाजिक मसलें हल होने की उम्मीद आप नहीं कर सकते। साथ
ही, आज आप सŸा पर आसीन करने के लिए जिनकी मदद करेंगे, उन्हीं को गद्दी
से नीचे खींचने में आपको आगे चल कर क्रांति भी करनी पड़ सकती है!
सज्जनों, मेरी यह सलाह एक बहुत बडे़ राजनीति के दर्शनशास्त्री - एडमंड बर्क
द्वारा भी दी गई सलाह है। वह कहता है, अपनी स्वीकृति देते वक्त अन्यों द्वारा हम
खुद अपने तिरस्कार का कारण बने, इतनी अधिक चौकसी दिखाना भी, आसानी से
विश्वास कर सर्वनाश के लिए जिम्मेदार होने से बेहतर होता है, इस सलाह के अनुसार
मुझे ऐसा लगता है कि, सामाजिक समस्या को हल करने की व्यवस्था पर विशेष बल
देकर राज्य के सिंंवधान में ही सामाजिक मसलों के बारे में संमत प्रावधानों को दर्ज
किया जाए। हमें इस बारे में आग्रह कायम रखना होगा। हमें इस बात के प्रति आग्रही
होना चाहिए कि राज्य के संविधान में सामाजिक मसलों के बारे में होने वाली सुलह
को दर्ज किया जाए। जो लोग अनिर्बाध शासनसŸा अपने कब्जे में करने की कोशिशों
में लगे हुए हैं, उनकी इच्छा पर यह मामला कŸाई नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
(क) दलित वर्ग के लिए सुरक्षा की व्यवस्था
- इसीलिए, मुझे साफ-साफ बताना होगा कि, सामाजिक समस्याएं भारतीय
स्वराज के रास्ते में रोडे बनती हैं। ऐसा हमें भले नहीं लगता हो लेकिन भारत की
राजनीतिक पुनर्रचना करते समय दुर्बल सामाजिक घटकों को दुख की खाई में धकेला
न जाए इसके लिए भारत के संविधान, जिसमें कहा गया है कि, ‘राजनीतिक संतुलन
अमल करने की जरूरत नहीं है’, में जो राय व्यक्त की जा रही है उसका हम विरोध
करते हैं। केवल दलित वर्ग के संदर्भ में कहें तो यह सोचा जाए कि यह समस्या किस
तरह अच्छे से अच्छे तरीके से हल की जा सकती है इस बारे में ऊहापोह करने की
मेरी मंशा है। कुछ राजनीतिज्ञों के अनुसार इस सवाल को हल करने के लिए कुछ
उपाय करने होंगे और जो उपाय किए जाएंगे उन्हें स्वयंशासित भारत के संविधान में
समाविष्ट किया जाए, यह भी वे मानते हैं। राजनीति के इन विशेषज्ञों ने महायुद्ध के
बाद अस्तित्व में आए और मेरे भाषण के पहले हिस्से में जिसका जिक्र किया गया
है, उन राष्ट्रों के साथ घटी घटनाओं का अध्ययन करने के पश्चात् राह ढूंढने की