198 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की रक्षा करने की सबसे बड़ी गारंटी तभी हो सकती है, जब सŸा आपके हाथ में आए। क्योंकि उसके कारण आपके हितों के लिए बाधाजनक कार्य करने वालों को आप सजा दे सकते हैं। इतना ही नहीं, आगे भी जिन बाधक, हानिकारक कामों की संभावना हो, उन पर रोक लगाने के लिए भी ठोस इंतजाम किया जा सकता है। गवर्नर हो, वायसराय हो अथवा राष्ट्रसंघ हो किसी तीसरे के हाथ में यह सŸा देकर इसे हल (साध्य) नहीं किया जा सकता। जिसके हाथ में हम यह अधिकार सौंपेंगे उससे हस्तक्षेप, बीच-बचाव करने की मांग करने पर अगर वह साफ इनकार कर दे तो हमें इस अधिकार का क्या फायदा होगा? अपनी हितरक्षा के लिए हमें भावी स्वयंशासित भारत के कार्यकारी मंडल पर कब्जा पाना ही एकमात्र कारगर उपाय होगा, ऐसा मुझे लगता है। देश के विधिमंडल में प्रतिनिधित्व प्राप्त करने से ही यह संभव हो सकता है। सिर्फ इसी एक साधन के सहारे सŸाधारियों की रोजमर्रा की हरकतों पर हम नजर रख सकते हैं। आपको अगर और कोई सुरक्षा के उपाय और गारंटी मिल रही हो तो उसे भी ले लीजिए। उससे आपकी सुरक्षा के साधनों में इजाफा होगा। लेकिन ठीक-ठीक योग्य प्रतिनिधित्व के बदले आप किसी अन्य बात को न स्वीकारें। और आपको निश्चित प्रतिनिधित्व दिए बगैर अगर वर्तमान संविधान में बदलाव लाने की कोशिश की गई तो, उसे नकारना, उसे न मानना पूरी तरह आपके अधिकार की बात है।
- ”निश्चित प्रतिनिधित्व“, शब्द आज हर अल्पसंख्यक जनजातियों के मुंह से सुनाई देता है। इस मामले में सही आंकड़ा देना बेहद कठिन है, इस कारण यह हास्य-व्यंग्य, मजे का विषय होकर रह गया है। इसीलिए, आपको अगर अपनी मांगें सामने रखनी हों तो उस शब्द का निश्चित अर्थ हमें ठोस संख्या और आंकड़े के रूप में तैयार करना होगा। काँग्रेस के खेमे में प्रचलित राय के अनुसार जरूरी प्रतिनिधित्व का मतलब जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व इस प्रकार लिया जाता है। मेरी राय में अल्पसंखक प्रतिनिधित्व के बारे में यह बिल्कुल गणिती बुद्धि की सोच, अपरिपक्व और मूर्खताभरी कल्पना है। भारत के बहुसंख्यकों के मन में अल्पसंख्यकों के लिए जो अनुदारता की भावना है, उसी की यह प्रतिक्रिया है। अपने जातिबांधवों से तथा उनके सामाजिक दरजे से जितनी ताकत मिल सकती है वह शक्ति इन अल्पसंख्यकों के पास है, लेकिन वह बहुत ही कम है इसका अहसास होने के कारण ही ये जातियां अपनी सुरक्षा के लिए उसमें बढ़ोतरी होने की मांग कर रही हैं। इस तरह के प्रतिनिधित्व में बढ़ोतरी के बगैर सरकारी सŸा से सुसज्ज बहुसंख्यकों का सामना करने के लिए वे पूरी तरह से समर्थ हैं, ऐसा उन्हें नहीं लगता। इस नजरिए से देखें तो अल्पसंख्यकों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में जो जगहें मिलनी हैं, उनमें बढ़ोतरी करने से ही उन्हें सुरक्षा प्रदान की गई है ऐसा लगेगा। यह अगर सच है तो