200 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इसीलिए ऊपर बताई गई विपरीत मानसिकता का विरोध किया जाना चाहिए। क्योंकि उससे देश के हित को और अन्य अल्पसंख्यकों के हित को भी नुकसान पहुंचने की संभावना पैदा होती है।
अल्पसंख्यकों को देने वाली तराजू का पासंग समतोल रखने के लिए अतिरिक्त जगहें किस सिद्धांत के आधार पर दी जाएं इस बारे में सही मार्ग के बारे में इससे पहले ही मैंने सूचित किया है। इसीलिए, कितनी जगहें दी जानी चाहिएं यह सवाल अभी भी बाकी है। प्रतिनिधियों की संख्या परिस्थितिनुसार बदलनी चाहिए। और उनकी संख्या तय करने के लिए सामान्य सिद्धांत का सुझाव देने से अधिक और कुछ नहीं किया जा सकता। वह सिद्धांत इस प्रकार है पहले बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदाय आपसी सोच-विचार के बाद जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व से अतिरिक्त और अधिक कितनी जगह पासंग की जगहों के तौर पर दी जा सकती हैं, इस बात का निश्चित आंकड़ा तय करना होगा। फिर किसी विशिष्ट अल्पसंख्यक समुदाय के अतिरिक्त प्रतिनिधित्व का हिस्सा तय करते हुए यह अतिरिक्त प्रतिनिधित्व उस समुदाय की सामाजिक परिस्थिति के विपरीत अनुपात में तय करें। इस सामाजिक परिस्थिति के बारे में निर्णय लेते हुए उस समुदाय के सामाजिक दर्जे, आर्थिक बल और उसकी शैक्षिक स्थिति भी ध्यान में लेनी चाहिए। अगर यह संभव हो पाया तो अन्य अल्पसंख्य समुदायों के साथ भी न्याय होगा और सही ढंग से सुलह हो पाएगी। किसी भी पक्ष को शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।
इसके बाद विचारार्थ जो विषय चुने गए हैं वे हैं, चुनाव क्षेत्र और मतदान के अधिकार। सज्जनों, इस संदर्भ में हमारी क्या मांगें होनी चाहिएं? चुनाव क्षेत्र की रचना के बारे में हमारे सामने दो विकल्प हैं। पहला है - अलग चुनाव क्षेत्र की योजना और दूसरा - आरक्षित जगहों के साथ संयुक्त चुनाव क्षेत्र की योजना। मैं जानता हूं कि इस विषय में दलित वर्ग में मतभेद हैं। बहुत बड़ी जनसंख्या अलग चुनाव क्षेत्र के पक्ष में है। उन्हें डर लगता है कि संयुक्त चुनाव क्षेत्र के तरीके में बहुसंख्य समुदाय भी हमारे उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने वाले हैं, इसलिए, जो उनके लिए हितकारी हो उसी के पक्ष में वे मतदान करेंगे ऐसा उन्हें लगता है। यह डर निर्मूल है, ऐसा मैं नहीं कह सकता। लेकिन केवल इसलिए अलग चुनाव क्षेत्र में खुद को कैद करना यही एक मार्ग नहीं बचता। इस मामले में एक और विकल्प भी उपलब्ध है - वयस्क मतदान की मांग करते हुए अपने समुदाय की मतदान की शक्ति ज्यादा से ज्यादा बढ़ा कर लेना भी एक उपाय है। सो, बहुसंख्यक समुदाय के मतदाताओं द्वारा अपने उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने से जो दुष्परिणाम हो सकते हैं उन्हें कम किए जाने की संभावना का निर्माण भी हो सकता है। वयस्क मतदान के लिए हमें विशेष आग्रह के साथ मांग करनी ही चाहिए, यह कह कर