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आगे मैं यह कहना चाहता हूं कि अगर वयस्क मतदान प्राप्त हुआ तो हमें दलित वर्ग के लिए आरक्षित जगहें रखते हुए संयुक्त चुनाव क्षेत्र स्वीकारने में भी कोई आपिŸा नहीं होनी चाहिए।
इस बारे में मैं एक और बात का खुलासा करना चाहता हूं। यह देश जाति-समुदायों में, पंथो में बंटा हुआ है। इसलिए जाति-समुदायों की सुरक्षा का प्रबंध जब तक संविधान में ही नहीं किया जाता तब तक यह देश अखंड और स्वयंशासित नहीं बन सकता। यह वास्तविकता है, और इस पर आपिŸा नहीं की जा सकती। लेकिन अल्पसंख्यकों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि आज भले हम पर ये अलग-अलग पंथ हावी हो गए हैं और हम जातियों में विभाजित हो गए हैं, लेकिन हमारा लक्ष्य है अखंड भारत। जिन अल्पसंख्यकों को अपनी प्रतिष्ठा का खयाल है, उन्हें यही उद्देश्य अपनाना चाहिए। इससे एक बात साफ समझ में आती है कि जिन अल्पसंख्यक समुदायों ने सुरक्षा के प्रबंध की मांग की है, उन्हें अपने सुरक्षा संबंधी अधिकार प्राप्त करते समय इस बात का भी खयाल रखना होगा कि वे भारत की एकता की राह के रोडे़ न बनें। आप पर जो बंधन लादे गए हैं, आपके सामने जो अडचनें हैं वे सत्य हैं इसलिए उनके खिलाफ सुरक्षा पाने के लिए जी-तोड़ कोशिश कीजिए। आपके लिए तैयार किए गए सुरक्षा प्रबंध इस देश में मौजूद भेदभाव की खाई को अक्षुण्ण रखने का कार्य ना करें,ं इस बात का खयाल अवश्य रखें। अलगाव की इस खाई को पुल के द्वारा पाटा जाए, यही उम्मीद हमें रखनी चाहिए। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से संबंधित सुविधाओं को स्वीकृति देना, बहुसंख्यक समुदायों का कर्तव्य है। लेकिन अल्पसंख्यकों का भी यह पवित्र कर्तव्य है कि वे सबको एक करने की राह में रोडे न अटकाएं। इस नजरिए से कहना पडे़गा कि संयुक्त चुनाव क्षेत्र की योजना व आरक्षित जगहें, अलग चुनाव क्षेत्र से अधिक उŸाम उपाय है।
दलित वर्ग की सुरक्षा के लिए एक और बात खासा महत्व रखती है। उसका संबंध सरकारी नौकरियों में प्रवेश पाने से है। कानून तैयार करने के अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण एक बात है। कानून बनाने के अधिकार से अधिक कानून का क्रियान्वयन करने के अधिकार का महत्व कम नहीं है। और अमल करने वाली व्यवस्था के जरिए कानून बनाने वालों को भले पूरी तरह हतोत्साहित नहीं किया जा सकता, लेकिन उस पर अंकुश जरूर रखा जा सकता है। लेकिन सिर्फ यही एक कारण नहीं है जिसके लिए प्रशासन की कार्यकारिणी पर दलित वर्ग को कब्जा पाने की आतुरता हो। काम की हड़बड़ी के कारण या हालात के कारण कई बार उसे लागू करने वाले अधिकारी को तारतम्यता के साथ निर्णय करने का अधिकार भी होता है। उस प्रसंग के अनुसार उचित निर्णय देने के अधिकार पर निष्पक्ष ढंग से अमल हो पा रहा है अथवा नहीं, इस पर ही जनता का कल्याण निर्भर करता है। भारत जैसे देश में जहां