33. अखंड भारत हमारा ध्येय है - अगस्त 1930 नागपुर - Page 220

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आजादी नहीं मिलती। खेद की बात है कि साइमन कमीशन ने इस दुष्ट पद्धति का त्याग नहीं किया। आज भी वे इसी बात से चिपके हुए हैं और उन्होंने अनुशंसा की है कि चुनाव कराने के लिए अगर योग्य उम्मीदवार नहीं मिलते हैं तो गवर्नर दलित वर्ग के प्रतिनिधि का चुनाव करें। सिर्फ इतना ही नहीं तो जो दलित वर्गों से नहीं हैं, ऐसे व्यक्ति को भी दलित वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करने का अधिकार देने वाली अप्रत्याशित अनुशंसा भी साइमन कमीशन ने की है। हालांकि, यह आरक्षित उपाय होने के कारण इस पर सोच-विचार के लिए हमें ज्यादा समय खर्च करने की आवश्यकता नहीं है। किन्तु, साइमन कमीशन की प्रमुख योजना भी मेरी राय में स्वीकारने योग्य नहीं है। उसके अनुसार दलित वर्ग के लिए आरक्षित पद रखते हुए संयुक्त चुनाव क्षेत्र द्वारा उनके प्रतिनिधियों का चुनाव होना है, अगर यह संभव हो पाता, तो अपनी वर्तमान स्थिति में इससे बहुत सुधार हो सकता था। लेकिन इसमें एक और बेढंगी शर्त रखी गई है कि प्रांत के गवर्नर से इस अर्थ का प्रमाण-पत्र प्राप्त किए बगैर दलित वर्ग का कोई भी उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ सकता। यह पद्धति अस्वीकारणीय है। इसकी वजह यह है कि यह पद्धति फिलहाल नियुक्ति का जो तरीका अस्तित्व में है उससे यह प्रस्ताव बेहद मिलता-जुलता है कि दोनों में से किसका चुनाव करें यह कहना मुश्किल है। और जिन चुनाव क्षेत्रों में उम्मीदवार की केवल एक ही जगह है वहां गवर्नर किसी एक को ही इस तरह का प्रमाण-पत्र देने वाले हैं। सो ऐसे चुनाव क्षेत्रों के बारे में चुनाव की यह पद्धति सीधी-सादी नियुक्ति की पद्धति ही साबित होती है। प्रमाणपत्र वाला यह नुस्खा वास्तव में किस तरह से काम करने वाला है इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। साथ ही, प्रमाण-पत्र देने के लिए किन बातों पर गौर किया जाएगा, यह भी स्पष्ट नहीं है। साइमन कमीशन की सूचना बताती है कि गवर्नर दलित वर्ग के संगठनों से सलाह लेकर यह तय करें या अगर उन्हें योग्य लगे तो इस तरह की सलाह के बगैर भी सर्टिफिकेट दें। इन दोनों में से किसी भी सूचना के लिए आप सहमति न दें। संगठनों की सलाह लेने का तरीका अगर लागू किया गया तो भले कितना भी अप्रिय क्यों न हो जनता अपने उम्मीदवार को स्वीकृति दिलाने के लिए, केवल उसे समर्थन दिलाने के लिए कई जाली संगठन उठ

खड़े होंगे। दूसरी पद्धति पर अगर अमल किया गया तो उसके परिणामस्वरूप गंदी लालफीताशाही पनपेगी और प्रमाण-पत्र देने की शक्ति मामलतदार या तहसीलदार के हाथ में होगी। क्योंकि गवर्नर को अगर कोई बौद्धिक नीति अपनानी होगी तो उसे अफसरों की सलाह के अनुसार ही प्रमाण-पत्र देना पड़ेगा। आप जानते ही हैं कि तहसीलदार और मामलतदार लोग किस वर्ग के लोग हैं। दलित वर्ग के बारे में और दलितों में से पढ़े-लिखे लोगों के बारे में उनकी मानसिकता कैसी है, यह भी आप जानते ही हैं। इसीलिए ये लोग प्रमाण-पत्र के लिए किस तरह के लोगों की सिफारिश करेंगे, इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं।