204 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
साइमन कमीशन के इस मत से कि दलित वर्ग के प्रतिनिधि को प्रमाण-पत्र की खास आवश्यकता है, मैं सहमत नहीं हूं। संसद की अकार्यक्षमता को दूर करने के लिए इस प्रकार की बंदिश अगर वे रखना चाहते हैं, तो मैं कहूंगा कि ऐसे और भी कई समुदाय हैं, कि इस तरह के प्रमाण-पत्र जिनके लिए लागू किए जाएं। अकार्यक्षमता के मायने अंग्रेजी के ज्ञान की कमी और उस भाषा में अपना मत व्यक्त करने की असमर्थता होगा, तो बॉंम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल के बहुसंख्यक अब्राह्मण और सिंधी मुसलमानों को अंग्रेजी नहीं आती थी, इस तरह के कई अन्य उदाहरण मैं जानता हूं। उन लोगों ने संसद में शायद ही कभी मुंह खोला हो, शायद ही कभी सवाल पूछा हो। विधानसभा में जो दलित वर्ग के प्रतिनिधि हैं, वे भी अपनी विधानसभा के ऐसे उदाहरण बता सकेंगे। उनको अगर प्रमाण-पत्र की आवश्यकता नहीं है, तो दलित वर्ग के लिए इसकी क्यों आवश्यकता हो, यह बात मेरी समझ से बाहर है। इसीलिए, साइमन कमिशन द्वारा तैयार की गई इस योजना को ठुकरा कर, किसी भी तरह की शर्त न रखते हुए हमें अपना प्रतिनिधि खुद चुनने की आजादी की मांग करनी होगी। अपने हित के बारे में निर्णय लेने के लिए हम खुद ही सर्वाधिकारी हैं और हमारा हित किसमें है, यह तय करने का अधिकार हमें गवर्नर को भी नहीं देना चाहिए।
केंद्रीय संसद के गठन के बारे में साइमन कमीशन की योजना के बारे में आपका क्या मत, विचार है, क्या जाने। वर्तमान विधानसभा चुनावों का तरीका और प्रांत के लेजिस्लेटिव एसेंब्ली के चुनाव प्रत्यक्ष पद्धति से होते हैं। इस बारे में साइमन कमीशन की सिफारिश यह है कि प्रांत की सभा के चुनाव की पद्धति जो फिलहाल है, वही कायम रहे, लेकिन विधानसभा के चुनाव प्रांत विधानपरिषद के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष तरीके से हो। मुंबई प्रांत के साइमन कमीशन के एक सदस्य के नाते मैंने इसके विरोध में एक ज्ञापन प्रस्तुत किया है, जिसमें यह सारे दोष गिनाए हैं। लेकिन साइमन कमीशन ने जिस रूप में यह योजना पेश की है, उससे कुछ सुविधाएं और असुविधाएं भी उभरने वाली हैं। पहली बात तो यह कि उसमें स्वतंत्र चुनाव क्षेत्र या संयुक्त चुनाव क्षेत्र के सवाल को टाल दिया गया है। दूसरी बात यह है कि उसमें दोहरे मतदान का अधिकार टाल दिया गया है। (एक प्रांतीय कौंसिल के लिए और एक संसद के लिए।) तीसरी बात यह है कि उसने संसद को सुचारू गुट का रूप दिया हुआ है। इसमें क्या-क्या असुविधाएं हैं, यह देखें तो सरकार और जनता के बीच की कडी में इससे बाधा आने की संभावना है। इससे राष्ट्रीय एकता की बढ़ोतरी पर असर होगा, वह रुक जाएगी, क्योंकि इसमें पूरे देश के साथ लोगों का जो कर्त्तव्य है उसका लोप होता है, और उनकी नजर में पूरे देश के बारे में उनका कोई भी कर्त्तव्य नहीं बचता। इस बारे में सुविधा की तरफ पलडा झुके या