205
असुविधा की तरफ पलड़ा झुके, लेकिन केंद्रीय संसद के बारे में साइमन कमीशन की योजना को जगह मिलनी ही चाहिए। हालांकि उसकी सही जगह के बारे में सवाल बाकी बचता ही है। केंद्रीय विधानसभा के लिए या कि राज्यसभा के लिए वह योजना योग्य रहेगी? साफ है कि यह योजना दोनों जगह लागू नहीं की जा सकती। अप्रत्यक्ष चुनाव पद्धति का सबसे बड़ा दोष है कि वह पहली बारी में ही खत्म हो जाती है। एक मतदाता एक ही बार वोट देता है इसलिए उसे विशेष महत्त्व होता है इस विचार से यह योजना लागू की गई होगी। दो बार मतदान करने की असल में कोई जरूरत ही नहीं बचती। इसका मतलब यह कि अगर दो सभागारों की पद्धति को अपनाना हो तो चुनाव की यह पद्धति विधानसभा पर लागू की गई तो राज्यसभा के सभासद चुनने का दूसरा तरीका नहीं बचता। आज के सरकार की रचना में राज्यसभा की रचना करने की पद्धति बेहद खराब है। और पुनर्परीक्षण करने वाली सभा के रूप में उसका अस्तित्व कायम करना हो तो आज जिस स्थिति में है उसी स्थिति में उसे हमेशा नहीं रखा जा सकता। मेरी राय यदि सही हो तो इसका यही मतलब निकलता है कि विधानसभा के लिए प्रत्यक्ष चुनाव पद्धति का अवलंब किया जाए और और अप्रत्यक्ष चुनावों से राज्यसभा की रचना की जाए। प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा ये चुनाव संतुलित प्रतिनिधित्व के तरीके से किया जाए। इस मामले में यही योग्य उपाय है। अंततः यही कहा जा सकता है कि केंद्रीय संसद खड़ी करने का मार्ग भले कुछ भी तय हो लेकिन यह स्पष्ट है कि दलित वर्ग के प्रतिनिधि के लिए अप्रत्यक्ष पद्धति ही आसान सिद्ध होगी। नियुक्ति की पद्धति से इसकी तुलना की जाए तो पता चलेगा कि वही हमारे लिए अधिक हितकारी है।
- प्रांतीय विधानसभाओं में दलित वर्ग का अस्तित्व बेहद कम है। इस बारे में 1919 के साऊथबरो कमेटी द्वारा बहुत अन्याय किया गया है। उस कमेटी द्वारा तय किए गए हिस्से में भारत सरकार ने भी बढोतरी करने का सुझाव दिया है। हालांकि वे गलतियां अभी भी वैसे के वैसे ही रह गई हैं। 1923 में नियुक्त की गई मुद्दीमन कमेटी ने संसद में दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व कितना अधिक कम है, इस बात की ओर ध्यान दिलाया था, हालांकि यहां-वहां एकाध सदस्य की बढ़ोतरी करने के अलावा इस शिकायत को दूर करने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किया गया था। दलित वर्ग को उसकी दुर्बल स्थिति में अधिकारी वर्ग की मदद पर निर्भर रहने के लिए कहा जाता है। अनुभव से हम जान चुके हैं कि अधिकारी वर्ग अपने अलावा और किसी का हितैषी नहीं होता। उसकी मित्रता और मदद उसके अपने हित-संबंधों पर निर्भर रहती है। बेहद खेद के साथ बता रहा हूं कि इन दस सालों में अधिकारी वर्ग ने दलित वर्ग से जितना लिया उससे बहुत ही कम दिया। जो भी हो, भविष्य में अधिकारी वर्ग से ऐसी मदद की आशा भी दलित वर्ग नहीं रख