33. अखंड भारत हमारा ध्येय है - अगस्त 1930 नागपुर - Page 226

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के लिए एक बड़ा वरदान ही साबित हुआ है, इस बारे में कोई शक नहीं। समता, स्वतंत्रता और बंधुभाव के मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित यूरोपीय संस्कृति के सहचर्य के बगैर हिंदू धर्म के कई बुरे सामाजिक, रीति-रिवाजों के बारे में उन्हें कभी शर्म नहीं महसूस होती। क्योंकि वह उनके धर्म और नीतिशास्त्र का एक हिस्सा था। इन दो संस्कृतियों के साथ आने के कारण उन दोनों के बीच के तीव्र विरोधाभास भारतीयों को समझ में आना, और इन सामाजिक कुरीतियों और रीति-रिवाजों को दूर करने की जरूरत उन्हें महसूस होने लगी। अन्य किसी भी उपाय के द्वारा पुनर्संगठन नहीं हो सकता था, जो इस मौके के कारण भारत को करना पड रहा है। अंग्रेजों के आने से पूर्व एक ही शासन पद्धति, और सब पर एक ही कानून लागू होने जैसी महत्वपूर्ण सुविधा भारत को कभी भी प्राप्त नहीं हो सकती थी। किसी भी देश के लिए यह कोई छोटी ताकत नहीं है। भारत के लिए इसका बहुत बड़ा मूल्य है। राष्ट्रीयता की भावना की जडें़ जितनी गहराई तक पनपनी हों, उतनी गहरे तक जमीन तैयार हो चुकी है और स्थिर राज्य की बुनियाद भी उन्होंने तैयार कर रखी है। उन्होंने मुद्रा, रास्ते, रेलवे, डाक आदि मोर्चों पर सुधार किए बगैर दे को आधुनिक संस्कृति में प्रयुक्त साधनों से दूर रखा, ऐसा भी हम नहीं कह सकते।

  1. यह सब सही है। लेकिन सवाल यह है कि यह सब उन्होंने किस चीज के बदले में किया? अंग्रेज प्रशासन के तहत भारतीय जनता एक तरह से बौनी होती जा रही है। उसकी प्रगति रोकी जा रही है, इसमें कोई दो राय नहीं। स्व. गोखले के शब्दों में कहना हो तो, पूरे दिन हमें कुंठाओं से ग्रस्त जीवन बिताना होगा और हममें से जो ऊंचे कद के हैं, उन्हें झुक कर जीना होगा। स्वयंशासित राष्ट्र में दिखाई देने वाली आत्मसम्मान की भावना किसी भी भारतीय में दिखाई नहीं देती है। जिस नैतिक आधार से स्वराज की मांग की गई है, वह शायद आपको पसंद न आए। इतना ही नहीं, यह देखकर आपको लगेगा कि जैसे कोई शैतान धर्मग्रंथ का जिक्र कर अपना काम करवा ले, उसी तरह ये पूंजीपति, ये सामंती लोग स्वतंत्रता की मांग कर रहे हैं। हो सकता है आपको यह सब मजेदार लगे। लोगों की नैतिक शक्ति की ओर देखा जाए तो लगता है कि अंग्रेजों का राज हमें काफी महंगा पड़ा है, इसमें कोई संदेह नहीं। किंतु इस बिंदू से भी आप शायद सहमत ना हों। आप कहेंगे कि इस देश में शांति और सुरक्षा कायम रखने के बदले में चाहे कोई भी कीमत देनी पड़े तो भी वह कम ही है। लेकिन शायद आपको भी मान्य हो, पसंद आए ऐसी एक बात इस देश में है और वह है इस देश के लोगों की दरिद्रता। दुनिया के किसी भी हिस्से में भारत की बराबरी कर सके ऐसी गरीबी है क्या? 19वीं शताब्दी के पहले 25 सालों में अंग्रेजों का राज एक सर्वमान्य हकीकत बनी तब दस लाख लोगों की जान लेने वाले पांच अकाल आए। अगले 25 सालों में दो बार अकाल आए और उसमें करीब