210 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
चार लाख लोग मृत्यु को प्राप्त हुए। तीसरे 25 सालों में छह बार अकाल पड़ा और उनमें मरने वालों की संख्या पचास लाख होने के यथार्थ को दर्ज किया गया। और इस उन्नीसवीं सदी के आखिरी पच्चीस सालों में हमने क्या पाया? अठारह अकाल! और इन अकालों में मरने वालों की संख्या एक करोड़ पचास लाख से दो करोड़ साठ लाख तक जा पहुंचा! और एक साल में सरकार के भिक्षागृह में रखे गए साठ लाख लोगों को इसमें जोड़ा नहीं गया है।
सज्जनों! इसकी वजह क्या हो सकती है? इसका कारण यदि साफ-साफ शब्दों में कहना हो तो अंग्रेजों द्वारा इस देश में लागू की गई नीति। वे हमेशा इस देश के व्यापार और कलकारखानों की उन्नति में बाधक बनते रहे हैं। यह केवल तर्क पर आधारित नहीं है, वे चाहते थे कि भारत का राज इस तरह से चलाया जाए कि भारत, इंग्लैंड में बनने वाले माल का हमेशा के लिए ग्राहक बना रहे। अंग्रेजों के प्रशासन का यह सुनियोजित सूत्र था। उनकी इसी नीति के कारण भारत युगों-युगों तक के लिए दरिद्र देश बना रहा। देश को दरिद्र बनाने की इस विकसित क्रिया के शिकार मुख्य रूप से कौन बने? दलित वर्ग के जिन किसान लोगों को आज भी छह महीने भर पेट भोजन नहीं मिलता वही इसके शिकार हुए। उन्हीं की इसमें बलि चढ़ी। उनकी हमेशा की दरिद्रता के कारण उनकी हालत अकाल में बलि चढ़ने लायक तो थी ही। ये यदि आपके अपने लोग हैं, उनसे अगर आपका सचमुच जुड़ाव है, तो आप आंखें मूंदे उदासीन बैठे नहीं रह सकते।
सज्जनों! केवल नए रास्ते बना कर, नई नहरें खुदवाकर, रेलमार्ग बना कर, डाक से पैसा भिजवा कर, स्थिर मुद्रा लाने से भूगोल और खगोल शास्त्र की नई कल्पनाओं का प्रसार कर, या अंतर्गत कलह को रोकने को रेखांकित कर अंग्रेजों के नौकरशाह वर्ग के स्तुति सुमन गाते हुए आप बैठे नहीं रह सकते। सुरक्षा और सुव्यवस्था संभालने के कारण वे तारीफ के भी काबिल हैं। परंतु, सज्जनों! दलित और अन्य लोग केवल सुरक्षा और सुव्यवस्था खाकर जिंदा नहीं रह सकते। वे रोटी खाकर जिंदा रहते हैं, और हमें यह बात भूलनी नहीं चाहिए। जीवन के कठोर नियमों के कारण दलितों को भी ऐसी सरकार की मांग करना जरूरी हो जाता है कि जो देश में आर्थिक उन्नति लाए, और उसके द्वारा भौतिक जीवन में उन्नति आए। लोगों की दरिद्रता के पीछे कारण है, उत्पादन में कमी। आपमें से कोई यह ठोस मुद्दा उपस्थित कर, कह सकता है कि जितना भी उत्पादन आता है, उसका सही बंटवारा नहीं होता। मैं पहले ही इस बात को मान लेता हूं कि इस देश की गरीब मजदूर जनता से बडे़ जमींदार और पूंजीपति जबर्दस्ती जो पैसा वसूलते हैं, उस ओर गंभीरता से ध्यान देने पर साल भर अंग्रेजों की जो प्रशंसा की जानी है, उस पर पानी फिर जाता है। हालांकि, एक बात मेरी समझ में नहीं आ सकती कि लूटने वाले, शोषण करने वाले पूंजीपति और जमींदारों