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- यदि यह वैचारिक सोच आपको सही लगे तो भारत के आगामी सरकार के बारे में साइमन कमीशन की योजना को आप मान्यता नहीं दे सकते। कमीशन की रिपोर्ट के विस्तारपूर्वक विवेचन, विश्लेषण में मैं जाना नहीं चाहता, क्योंकि उसके लिए पर्याप्त समय नहीं है। साइमन कमिशन द्वारा सुझाई योजना में देश की सरकार का कितना उŸारदायित्व है? इस बात की ओर आपका ध्यान दिला कर ही मैं संतुष्ट हूं। केंद्र सरकार के कार्यकारी मंडल के मंत्रीमंडल की स्थिति में साइमन कमीशन ने कोई भी आमूलाग्र बदलाव नहीं सुझाया है। यह कार्यकारीमंडल जैसे अभी गैर जिम्मेदार है, वैसे ही आगे भी बना रहेगा। प्रांत का कार्यकारीमंडल विधानसभा को जवाबदेह बनाने की कोशिश की गई है। लेकिन उसे गवर्नर की सŸा के बंधनों में जकड़ा गया है। आपात्कालीन स्थिति में विधानसभा के लिए उŸारदायी न होनेवाले कार्यकारीमंडल की नियुक्ति करने का अधिकार गवर्नर को दिया गया है, और इस तरह कोई भी विभाग गवर्नर अपने हाथ में ले सकते हैं।
सज्जनों, साइमन कमीशन की इस योजना पर मैं केवल एक ही राय व्यक्त कर सकता हूं। इस समस्या की तरफ देखने के दो मार्ग हैं। पहला यह कि भारत की केंद्रीय विधानसभा और प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा कार्यकारीमंडल को कितने अधिकार दिए जाने चाहिए? दूसरी बात यह कि, कार्यकारीमंडल को केंद्रीय और प्रांतिक विधानसभाओं की तुलना में किस अनुपात में अधिकार दिए जाने चाहिए? इन दो में से साइमन कमीशन ने पहले मार्ग का चयन किया है। ऐसा अगर है तो हर किसी बात में यह उŸारदायित्व लागू किया जाना चाहिए था। प्रांतिक कार्यकारीमंडल को पूरी तरह उŸारदायी क्यों नहीं बनाया गया, इसका कोई ठोस कारण मुझे दिखाई नहीं देता। और मिलिट्री और विदेश व्यवहार अगर छोड़ दें, तो केंद्रीय मंत्रीमंडल को भी उŸारदायी बनाना कठिन नहीं है, ऐसा मुझे लगता है।
- हममें से कुछ लोग कहेंगे दिल्ली अभी बहुत दूर है। फिलहाल तो दलित वर्ग अपने तक केवल प्रांतिक राज्य सरकार तक की सीमा तय कर लें। ऐसे लोगों को मैं सुझाव देना चाहता हूं कि, वे अपने प्रांतीय अथवा केंद्रीय मंत्रीमंडल के उŸारदायित्व के बारे में अपनी राय बनाते हुए दो बातें ध्यान में रखें। पहली बात यह कि, दलित लोगों के साथ-साथ अन्य लोगों का भविष्य, उनका कल्याण भी अधिक व्यापक रूप से और घनिष्ठता से प्रांतिक सरकार से कहीं अधिक देश की केंद्रीय सरकार पर निर्भर होता है। और इसीलिए, केंद्रीय सरकार की यह चक्की कैसे चलेगी, आसानी से चलेगी भी कि नहीं, इसी पर पूरे देश की प्रगति निर्भर करती है। विधानसभा के बारे में उसे कितनी सहानुभूति है इसी बात पर उसकी पीसने की क्षमता निर्भर करेगी। इस दृष्टिकोण से देखने के बाद पता चलेगा कि, यदि आप देश की जनता की नैतिक और भौतिक समृद्धि चाहते हैं, तो आप केंद्र सरकार के उŸारदायित्व के प्रति उदासीन