214 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नहीं रह सकते। लेकिन इस निर्णय को सूचित करने के पीछे एक और नजरिया
है। सुरक्षा और व्यवस्था की जिम्मेदारी निभाने के बारे में प्रांतिक सरकार हमेशा केंद्र
सरकार की जिम्मेदार प्रतिनिधि के तौर पर रहेगी। इन दोनों को अगर एक-दूसरे
की सहायता से काम करना हो तो इन दोनों को एक ही अधिकारी से आदेश मिलने
चाहिए। प्रांतिक या राज्य सरकार का कार्यकारीमण्डल, प्रांतीय विधानसभा के प्रति
जवाबदेह होने के कारण वह केन्द्रीय मंत्रीमंडल के आदेष का पालन करने के लिए
बाध्य नहीं होगा। क्योंकि, इस केन्द्रीय मंत्रामंडल की योजना में केंद्रीय विधानसभा की
जगह देश के सचिव को जवाबदेह बनाया गया है। और इस तरह सुचारू तालमेल
के अभाव में आपात स्थिति में देश का प्रशासन पूरी तरह दुर्बल साबित होने की
संभावना है। इसलिए, आपको चाहे पसंद हो या नापसंद हो, आप प्रांतीय मंत्रीमंडल
का उŸारदायित्व ऐसे हालात में केंद्रीय मंत्रीमंडल को नहीं सौंप सकते।
- सज्जनों! हम जब आरक्षित स्थानों के साथ-साथ उपनिवेश में स्वराज्य का
समर्थन कर रहे हैं, तो महात्मा गांधीजी ने पिछले मार्च महीने से इस देश में जो
असहयोग आंदोलन शुरू किया है उसमें शामिल होना क्या हमारा कर्त्तव्य है? इस प्रश्न
के संदर्भ में आपको अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी। मैं मानता हूं कि, सभी उदारमत
वादी लोगों ने दोष दिया है कि यह असहयोग आंदोलन गैर-कानूनी है, लेकिन मुझे यह
तर्क युक्तिवाद पसंद नहीं है। यदि पुरातनपंथी लोग आपसे यह कहें कि आपका मंदिर
प्रवेश का आंदोलन गैर-कानूनी है, तो आप क्या जवाब दोगे? इस प्रकार सीधे-सीधे
कार्रवाई करने के बजाय क्या पुरातनपंथी लोगों से विनती, अपील करना कानून के
अनुसार होगा? या फिर कानून को ही बदलना कानूनन सही होगा? पुरातनपंथी लोगों
के साथ छेड़ी गई आपकी आजादी की लड़ाई में आपके साधनों पर इस तरह के
प्रतिबंध लगाना क्या आपको सही लगता है? मुझे लगता है कि अगर कोई स्वीकृत
संवैधानिक मार्ग पहले से तैयार हो तो आप कानूनी मार्ग को अपनाने का आग्रह कर
सकते हैं। लेकिन जहां इस तरह संविधान में कोई प्रावधान ना हो वहां कानूनी मार्ग
का उपदेश सुनने के लिए बहुत कम लोग तैयार होंगे। अंग्रेजों के लिए भी यह विचार
नया नहीं है। अल्स्टर आंदोलन क्या असहयोग आंदोलन नहीं था? और क्या कई श्रेष्ठ
अंग्रेज राजनीतिज्ञों ने उसका समर्थन नहीं किया था? यहां केवल यही प्रश्न महत्त्वपूर्ण
है कि, अपने हितसंबंधों के नजरिए से वह समयोचित है या नहीं। असहयोग के इस
आंदोलन का मैं इसलिए विरोध करता हूं क्योंकि वह कŸाई समयोचित नहीं है। इस
बारे में मुझे पूरा यकीन हो गया है। मेरे अलावा भी अन्य कई लोगों की यह राय है कि
साम्राज्यवाद में दोष होंगे, लेकिन अंग्रेज साम्राज्य ने भारतीय लोगों की प्रगति के द्वार