33. अखंड भारत हमारा ध्येय है - अगस्त 1930 नागपुर - Page 232

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खुले रखे हैं। यह बात महात्मा गांधी को भी स्वीकार्य है, जो यह कहते हैं कि भारत में प्रस्थापित सरकार का विश्वासघात न करना मेरा अनिवार्य कŸार्व्य है। अंग्रेजों के साम्राज्य की इस तरह की केवल मानसिकता थी ऐसा नहीं है। भारत के स्वयंशासन की प्रगति के लिए प्रांतीय सŸा की जिम्मेदारी लोगों को सौंप कर अपना उद्देश्य प्रत्यक्ष रूप में कार्यान्वित करने की कोशिश भी उसने 1920 में की है। हो सकता है कुछ कमी रह गई हो जिस कारण हम उसे आदर्श नहीं कह सकते। शायद अपने उद्देश्य की तरफ बढने की उसकी गति धीमी हो, लेकिन जो नीति तय की गई थी, अंग्रेज सरकार उसके खिलाफ रही हो, क्या हम ऐसा कह सकते हैं? योग्य उद्देश्य के खिलाफ अगर उनका बर्ताव रहा हो तो असहयोग आंदोलन छेड़ने का यह सही वक्त है, इस बात को हर कोई समझ जाता। लेकिन बात ऐसी नहीं है, वॉइसराय की घोषणा के द्वारा अंग्रेजों ने अपना उद्देश्य साम्राज्य के तहत स्वराज देने की बात को एक बार फिर साफ-साफ शब्दों में दोहराया है। और उस उद्देश्य का प्रत्यक्षीकरण जल्द से जल्द हो इसलिए भारतीय लोगों को गोलमेज सम्मेलन में बात करने का मौका देकर स्वराज के बारे में चर्चा करने का मार्ग खोल दिया है। साम्राज्य के तहत स्वराज की मांग करने वालों के अनुसार इसमें कई सारी त्रुटियां हो सकती हैं, यह सच है। लेकिन गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने से काँग्रेस ने इनकार किया इसके पीछे यह वजह नहीं थी। वायसराय के साथ या अंग्रेज मंत्रीमंडल के साथ किसी आश्वासन के लिए या किसी करार के लिए या अन्य किसी उद्देश्य के लिए लड़ना भले सही हो, लेकिन उसका कोई असर नहीं होने वाला है। क्योंकि इस तरह का अनुबंध बनना भारतियों की एकत्रित आवाज पर ही निर्भर करता है। और उपनिवेश के स्वराज के लिए हम सभी भारतीयों की आवाज को अगर जोड़ सकते हैं तो निश्चत तौर पर ब्रिटिश पार्लियामेंट पर उसका असर होगा। जो भी हो, लेकिन कांग्रेस अगर गोलमेज परिषद में जाना स्वीकारती तो उसमें किसी तरह का कोई नुकसान तो नहीं था। इस कोशिश में अगर सफलता नहीं भी मिलती तब भी काँग्रेस को अपना असहयोग का कार्यक्रम एक साल के लिए आगे टालना पड़ता। और उसमें भी उसका कोई नुकसान नहीं होता। उल्टे, फायदा ही होता। गलत वजह के लिए हो या सही वजह के लिए हो आज अंग्रेज सरकार पर जिनकी श्रद्धा है, उनका भ्रम तो कम से कम दूर होता। इन सभी बातों पर गौर करते हुए ऐसे समय काँग्रेस को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू कर देना चाहिए और कोई भी बता सकता है कि गोलमेज सम्मेलन द्वारा उपलब्ध कराया गया शांतिपूर्ण ढंग से बातचीत करने का मौका मना कर काँग्रेस ने बहुत बड़ी गलती की।

  1. इस सविनय अवज्ञा आंदोलन का मैं समर्थन नहीं कर सकता। इसकी एक और वजह है। मेरी राय में यह आंदोलन हमारे हितसंबंधों के, सुरक्षा के और सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी ठीक नहीं हैं। सविनय अवज्ञा आंदोलन जनता का आंदोलन