216 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है। जबरदस्ती इस आंदोलन का मुख्य सिद्धांत है। गैर-जिम्मेदाराना भगदड़ मचाने अथवा अफरा-तफरी के इस तरीके को बहुत बड़े पैमाने पर शुरू किया जाए, तो उसे क्रांति का रूप धारण करने में देर नहीं लगेगी। कोई क्रांति फिर वह रक्तरंजित हो या रक्तविहीन हो - कोई फर्क नहीं पड़ता। सफलता के नजरिए से बेहद अनिश्चित होने के कारण इस पद्धति में अफरा-तफरी मचने की और भयंकर प्रसंग निर्माण होने की संभावना ज्यादा होती है। फ्रेंच क्रांति का उदाहरण हमारे सामने है ही। उसका प्रकट उद्देश्य जनतंत्र की स्थापना था। लेकिन आखिर उसका असर अनिर्बंध तानाशाही के निर्माण में हुआ। कई बार क्रांति अनिवार्य होती है। जिस तरह विजय के कारण किसी राष्ट्र से या किसी वंश से दूसरे के हाथ में सŸा जाती है। उसी प्रकार विद्रोह के कारण भी सŸा, एक पक्ष के हाथों से दूसरे पक्ष के हाथों में चली जाती है। लेकिन इस तरह का बदलाव अन्दर से खोखला होता है। मुझे यकीन है कि हमें उससे संतुष्ट होना संभव नहीं। भारतीय समाज में आज जो शक्तियां कार्यरत हैं, उनमें राजनीतिक सŸा के बंटवारे द्वारा ही अपेक्षानुकूल असली बदलाव पैदा हो सकता है, हम इस तरह का सŸांतर चाहते हैं। ऐसे सŸांतर के लिए सुलह की जरूरत है। ऐसी सुलह होने पर तथा उस पर प्रत्यक्ष रूप से कार्रवाई होने पर ही दलित वर्ग का भविष्य पूरी तरह निर्भर है। भारत की असली समस्या केवल सरकार की स्थापना करना न होकर या सिर्फ आजादी पाना न होकर सही मायने में स्वतंत्र शासन सŸा स्थापन करने की है। और एडमंड बर्क की भाषा में फिर से बताना होगा तो- सच्ची सरकार की स्थापना करने के लिए बेहद अक्लमंद नजरिए की जरूरत होती है। शासन सŸा की जगहें निश्चित कीजिए। लोगों को आज्ञाकारी होने की शिक्षा दें। और फिर समझ लें कि आपका काम पूरा हुआ। सिर्फ आजादी देना आसान काम है। उसका मार्गदर्शन करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। जरूरत होती है तो उसके केवल शासन या सŸा छोड़ देने से काम बन जाता है। लेकिन असल स्वतंत्र सरकार बनाना यानी स्वतंत्रता के लिए उत्सुक सभी विरोधी शक्तियों को समक्ष बुला कर एक झंडे के तले लाना, एक राष्ट्रीयता के धागे में उन्हें बांधना यह कितना कठिन कार्य है और उसके लिए गंभीर चिंतन की जरूरत होती है। और यह सवाल सही सुलह का है। सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसे भगदड़ भरे तरीके से उसे पाना संभव नहीं, इसका मुझे यकीन है।
- सज्जनों! इस सविनय अवज्ञा आंदोलन को इन्हीं वजहों से दलित वर्ग द्वारा समर्थन नहीं दिया जाना चाहिए, ऐसा मुझे लगता है। गोलमेज सम्मेलन द्वारा उपलब्ध होने जा रहे शांतिपूर्ण तरीके से ही उनका काम अधिक आसान होगा। इसीलिए आपको आग्रहपूर्वक कहना चाहिए कि इस गोलमेज सम्मेलन के लिए हमारे बेहद भरोसेमंद और श्रेष्ठ योग्यता वाले कुछ लोगों को लिया जाए।