33. अखंड भारत हमारा ध्येय है - अगस्त 1930 नागपुर - Page 234

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  1. मेरे अनेक मित्रों का कहना है कि, हमारी इस स्थितप्रज्ञ नीति के कारण दलित वर्ग का बहुत बड़ा नुकसान होगा। उनकी राय है कि दलित वर्ग को अंग्रेज सरकार के साथ या इंडियन नेशनल काँग्रेस के साथ जुड़कर रहना चाहिए। मैंने उनकी इस सलाह पर कई बार सोचा तो मुझे यकीन हुआ कि इन दोनों से अलग रहने में ही दलित वर्ग की सुरक्षा है। जैसे कि मैंने पहले ही बताया है, मैं साम्राज्यांतर्गत स्वराज का विरोध नहीं कर सकता। क्योंकि मुझे इस बात का पूरा यकीन है कि अंग्रेज सरकार हमारी समस्या का समाधान ढूंढने के लिए कभी भी समर्थ नहीं थी। लेकिन काँग्रेस में शामिल होने के कारण ही अपना सवाल हल होने की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं। हमारी समस्या हल होने की दिशा में हमारी प्रगति हो रही है, यह मैं बिना सोचे-समझे कैसे कह सकता हूं? कहा जाता है कि काँग्रेस अस्पृश्यता पालन को मान्यता नहीं देती। सारी जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली केवल यही एकमात्र संस्था है। इसमें कोई शक नहीं कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में काँग्रेस ने अस्पृश्यता के रिवाज का निषेध करने वाला प्रस्ताव पारित किया है। लेकिन उस पर अमल करने के लिए काँग्रेस ने प्रचार-प्रसार के लिए अपने सदस्यों पर खादी के इस्तेमाल की शर्त लगाई है। लेकिन अस्पृश्यता का पालन न करने की शर्त काँग्रेस ने अपने सदस्यों के लिए क्यों नहीं रखी? इस तरह के बंधन पर आसानी से अमल किया जा सकता था। स्पृश्य सदस्य अपने-अपने घर में अस्पृश्य नौकर रख कर या किसी अस्पृश्य छात्र को अपने घर में रख, उसे पढ़ाई करने की सुविधा देकर इस शर्त का पालन आसानी से किया जा सकता था। महात्मा गांधी ने अस्पृश्यता निवारण के लिए जो उपाय किए, उसके क्या फिर भी कोई परिणाम दिखाई देते हैं? उनका भले ही बहुत बड़ा नैतिक समर्थन हो, उनके व्यक्तिगत प्रभाव और उनके विशिष्टतापूर्ण साधनों पर ध्यान दें तो उन्होंने अस्पृश्यता के निवारण का अपना उद्देश्य साकार करने के लिए बहुत ही कम प्रयास किए हैं। हर वर्ष सूत कातने के लिए फंड इकठ्ठा करने के लिए वे चक्कर काटते हैं। उन्होंने अस्पृश्यता के खिलाफ क्या कभी ऐसी मुहिम छेड़ी है? चरखे पर अपना जितना समय व्यतीत किया उसका एक शतांष हिस्सा भी इस काम के लिए खर्च नहीं किया। हिंदू और मुस्लिमों के बीच एकता प्रस्थापित करने के लिए तीन हफ्तों तक उन्होंने अनशन रखा था। यह बात आप सब लोग जानते ही हो। किंतु स्पृश्यों के मन में अस्पृश्यों के लिए अधिक दयाभाव निर्माण हो इसके लिए गांधीजी ने क्या एक दिन का भी अनशन कभी रखा है? ये बातें अगर की जातीं तो कोई भी काँग्रेस के मंच को स्वीकार करता। लेकिन अस्पृश्यता का कलंक दूर करने के लिए काँग्रेस ने ईमानदार कोशिश की नहीं। और हम सब यह भी जानते हैं कि स्वामी श्रद्धानंद ने कॉंग्रेस का त्याग इसी कारण किया कि काँग्रेस इस मामले में दिखावे के अलावा और