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ने, रहे आजम उसी तरह“ इस उक्ति की तरह, भगवान जिस हाल में रखेंगे वैसे ही रहने की मानसिकता को त्यागना होगा। और लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करना होगा। क्योंकि जो उपलब्ध है, उसमें संतुष्ट न रहने की मानसिकता के कारण ही समाज की उन्नति होती है। आखिरी और बेहद महत्वपूर्ण बात यह है कि दलित वर्ग में उत्साह का निर्माण करना होगा। सो उनके मन का डर खत्म होगा और अन्य लोगों की तरह ही वे भी अपने मानवीय अधिकारों का इस्तेमाल करने लगेंगे। यह हमारे हाथ में केवल राजनीतिक सŸा के आने भर से नहीं होगा। हमें यह जानना होगा कि, अपना उद्देश्य हासिल करने का वह एक साधन है। मैं यह चेतावनी दे रहा हूं क्योंकि, दलित वर्ग के केवल कुछ लोगों को विधानसभा में प्रतिनिधित्व मिलने से दलित लोगों की यातनाएं खत्म होंगी ऐसी गलतफहमी कुछ लोगों को हो रही है। असल में यह काम सामाजिक उन्नति से ही हो सकता है। स्व. गोखले की ‘सर्वंट्स ऑफ इंडिया’ या स्व. लाला लाजपत राय की ‘सर्वंट्स ऑफ पीपल’ संस्था की तरह दलित वर्ग की एक संस्था स्थापन कर उस पर यह जिम्मेदारी सौंपनी होगी।
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- सज्जनों! जरूरत से बहुत लंबा भाषण देकर मैंने आपको परेशान किया है। मुझे इस बात का खेद है। किन्तु संक्षिप्तता हमेशा अपेक्षित होती है, लेकिन जहां राजनीति के बारे में कुछ भी न जानने वाले लोग जहां पहली ही बार इकठ्ठा हुए हों ऐसी जगह आपके सामने उपस्थित समस्या के हर पहलू पर मैं सोचना चाहता था। आपका जहां तक संभव हो अधिक से अधिक मार्गदर्शन मैं करना चाहता था। इसलिए, इस लंबे भाषण के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं, ऐसा मुझे लगता है। उम्मीद करता हूं कि, हमारी यह सभा आखिरी सभा साबित ना होकर, वह हमारे भव्य आंदोलन की यह केवल एक शुरुआत हो और उसके द्वारा हमारे लोगों को मुक्ति प्राप्त हो और इस देश में हर व्यक्ति यह एक मूल्य - राजनीतिक, सामाजिक, और आर्थिक मूल्य माना जाए ऐसे समाज का निर्माण का वह कारण बने।
आपने मेरा जो सम्मान किया है और मेरा भाषण सुन लिया, इसके लिए मैं आप सबका आभारी हूं। ख्1,
- ‘डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के भाषण’ - खंड-2, पृष्ठ सं. 65-98, सम्पादक - प्रो. मा. फ. गांजरे