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उन्नति में बाधक बनने वालों का निषेध
दिनांक 27 मार्च, 1920 के ‘मूकनायक’ में समाचार प्रकाशित हुआ था कि आगामी अप्रैल या मई माह में नागपुर में हिंदुस्तान भर के महार, मांग, चमार, पारिया, पंचम, आदि जातियों ने अपने बहिष्कार को खत्म करने और अपनी शैक्षणिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रगति करने के लिए एक परिषद् आयोजित करने की घोषणा की है। श्रीमन् महाराज शाहू छत्रपति सरकार करवीर (कोल्हापुर के शासक) इन्होंने इस परिषद की अध्यक्षता करना स्वीकार किया था।
घोषणा के अनुसार 30, 31 मई और 1 जून, 1920 को नागपुर में भारतीय बहिष्कृत परिषद का अधिवेशन हुआ। अस्पृश्य समाज की राजनीतिक अधिकारों की मांगों की पृष्ठभूमि में हो रही बहिष्कृत समाज की पहली अखिल भारतीय परिषद का ऐतिहीसिक महत्व था। इस परिषद के नियोजित अध्यक्ष छत्रपति शाहू महाराज थे। स्वागताध्यक्ष थे गोंदिया के बाबू कालीचरण नंदागवली और सेक्रेटरी थे गणेश आकाजी गवई और किसन फागूजी बनसोडे। इस परिषद में मद्रास, मुंबई, खड़कपुर, मध्यप्रांत और वर्हाड के 500 प्रतिनिधि उपस्थित थे। डॉ. अम्बेडकर, सी.ना. शिवतरकर, शिवबा जानबा कांबले, कदम, गो.गो.काले, ऐदाले, भोसले आदि प्रतिनिधि मुंबई से आए थे। इसी तरह कोल्हापुर से गैर-ब्राह्मण आंदोलन के प्रमुख कार्यकŸार् सर्वश्री रणदीवे, बाबूराव हैबतराव यादव, कोठारी, श्रीपतराव शिंदे, काबले, डिप्रेस्ड क्लास मिशन के सुपरिटेंडेंट श्री बर्वे आदि लोग पधारे थे। नागपुर से शिक्षित सुधारकों में से सर्वश्री सर गंगाधरराव चिटनिस और हिन्दू मिशनरी सोसाइटी के अधिकारी डॉ. परांजपे आदि उपस्थित थे।
परिषद् का विशाल मंडप स्टेशन से चार फर्लांग दूर पुराने आर्सेनल ग्राऊंड (कस्तुरचंद पार्क) पर बहुत सजावट के साथ लगाया गया था। बिजली के बल्व जगमगा रहे थे। मंच पर एक सिंहासन सजाया गया था। अस्पृश्य महिलाएं भी कार्यक्रम में उपस्थित थी। ख्1, 1920 की नागपुर परिषद के आयोजन का उद्देश्य
सन 1917 में भारत मंत्री माटेंग्यू के भारत में आगमन पर सर नारायणराव चंदावरकर और विट्ठल रामजी शिंदे के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल ने उनसे भेंट की थी। डिप्रेस्ड क्लास मिशन के अध्यक्ष नारायणराव चंदावरकर और वि.रा. शिंदे का अस्पृश्य समाज पर प्रभाव होने के कारण समाज के ज्यादातर कार्यकŸार् उन्हीं
- विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास - लेखकः एच.एल. कोसारे, पृष्ठ सं. 44-49