2. उन्नति में बाधक बनने वालों का निषेध - जून, 1920 नागपुर - Page 25

8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

से सलाह मशविरा कर काम करते थे। श्री गणेश आकाजी गवई और किसन फागू बनसोड़े ने भी डिप्रेस्ड इंडिया एसोसिएशन की ओर से भारतमंत्री को अस्पृश्यों की मांगों के बारे में एक मेमोरंडम दिया था।

इसके बाद साऊथबरो कमेटी भारत आई थी। हिन्दुस्तानी नेताओं ने स्वराज्य (होमरूल) की मांग उनके समक्ष रखी। डिप्रेस्ड क्लास मिशन के वि.रा. शिंदे ने अस्पृश्यों की मांगों के संदर्भ में सब जगह यह कुप्रचार शुरू किया था कि अस्पृश्यों को अलग प्रतिनिधित्व न देकर उनके हितों की रक्षा उच्चवर्णीय हिन्दुओं के हाथों में सौंपी जाए। चंदावरकर और शिंदे के विचारों के खिलाफ डॉ. अम्बेडकर 26 जनवरी के टाईम्स में - ए महार आन होम रूल (A Mahar onHome Rule) लेख लिखकर विचार प्रगट किए थे -ये हिन्दू अपने घर की गंदगी साफ करने के लिए तैयार नहीं हैं तो वे स्वराज्य क्यों मांग रहे हैं। इसलिए अस्पृश्य प्रतिनिधियों के जरिये अस्पृश्यों के विचार साऊथवरो कमेटी के सामने रखने की जरूरत पैदा हुई थी।

डॉ. अम्बेडकर ने कोशिश करके साऊथबरो कमेटी के सामने अस्पृश्यों की राजनीतिक मांगों को प्रस्तुत करने का अवसर प्राप्त कर लिया। कमेटी के सामने डॉ. अम्बेडकर और शिंदे ने अस्पृश्यों की मांगे अलग-अलग नजरियों से प्रस्तुत कीं।

शिंदे ने साऊथबरो समिति के सामने जो मांगे रखीं उन्हें यदि समिति स्वीकार कर लेती तो अस्पृश्य समाज अपने राजनीतिक अधिकारों से वंचित रह जाता। क्योंकि मतदान के लिए शिंदे ने अस्पृश्यों की जो योग्यता सुझाई थी वह अस्पृश्य समाज के मुट्ठीभर लोगों में भी नहीं मिल पाती और यदि मिल भी जाती तो तो ये मुट्ठीभर शिंदे के पिछलग्गू बनकर शिंदे या उनके समर्थकों को चुनकर देंगे और अस्पृश्यों के वास्तविक प्रतिनिधियों का चुनकर आना संभव नहीं हो पाता। इसलिए जिस तरह अस्पृश्यों को स्पृश्यों की सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक गुलामी स्वीकार करनी पड़ रही है उसी तरह अस्पृश्यों को स्पृश्यों की राजनीतिक गुलामी भी स्वीकार करनी पडे़गी। दूसरे शब्दों में वरिष्ठ हिन्दू लोग अस्पृश्यों पर राष्ट्रीय गुलामी लाद रहे हैं। इस परिस्थिति को पहचानकर डॉ. अम्बेडकर ने यह घोषित करने का निर्णय किया कि डिप्रेस्ड क्लास मिशन की ओर से दी गई कैफियत अस्पृश्यों के हितों में बाधक है। किसी प्रभावशाली व्यक्ति के द्वारा अस्पृश्यों की राजनीतिक आकांक्षाओं की सार्वजनिक अभिव्यक्ति हो इसलिए छत्रपति शाहू महाराज की अध्यक्षता में अस्पृश्यों का एक सम्मेलन बुलाने का फैसला किया गया। इसलिए 1920 में नागपुर में भारतीय बहिष्कृत परिषद का आयोजन किया गया।