34. देश के स्वराज का मैं समर्थन करता हूं - अक्तूबर 1930 मुंबई - Page 241

224 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हे दीन-हीनों के संबल महाराज, हमने सुन रखा है कि आपकी यात्रा सिर्फ लंदन तक सीमित ना होकर, आप लौटते वक्त ऊपर जिनका जिक्र किया है, उनके उद्धार के लिए आवश्यक आर्थिक सहायता पाने के उद्देश्य से अमेरिका और अन्य देश घूम कर वहां के सहृदयों की मदद का स्त्रोत इस अकिंचन जनवर्ग की ओर मोड़ने की कोशिश भी करने वाले हैं। आपका यह उद्देश्य बहुत ही स्तुत्य है। आपके जैसे विद्यावान, महान और स्वार्थरहित पुरुष को अमेरिका जैसे अमीर देश में आपके इस उद्देश्य में निश्चित रूप से सफलता मिलेगी और अपने लोगों का थोड़ा-बहुत कल्याण करने का सुयश आपको मिले, ऐसी हम कामना करते हैं तथा ”जो का रंजले गांजले, त्यांसी म्हणे जो आपुले, तोचि साधु ओलखावा, देव तेथेचि जाणावा“ (जो दुखी हैं, परेशान हैं, उन्हें जो अपना मानता है, उसमें साधु पहचानें, भगवान का वहीं दर्शन करें) इस साधु उक्ति की तरह आप सर्वमान्य और सर्वपूज्य हों और आपका जीवन सफल रहे।

आखिर में हम मन से यही चाहते हैं कि आपकी यह यात्रा अत्यंत सफल रहे और आपका स्वास्थ्य बेहतरीन रहे। आप जिस काम को करने के लिए जा रहे हैं, उसे पूरा करने की सामर्थ्य ऊर्जा आपके पास बनी रहे और सुकीर्ति संपादन कर आप सकुशल स्वदेश लौट आएं और हम सब आपके आने का उत्कंठा से इंतजार करते रहेंगे।

मानपत्र पढ़ने के बाद उसे थैली के साथ अध्यक्ष डॉ. सोलंकी के हाथों अर्पण किया गया। डॉ. अम्बेडकर ने उनका स्वीकार किया।

बाद में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर मानपत्र का जवाब देने के लिए खडे़ हुए। लेकिन उनका गला भर आया था, इसलिए 5-6 मिनटों तक वे कुछ बोल ही नहीं पाए। फिर संभल कर उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत की। उन्होंने कहा,

”अध्यक्ष महाराज और भाइयों और बहनों,

आज के दिन मैं आपको क्या सुनाऊं, मुझे कुछ सूझ नहीं रहा है। अब अगले पांच-छह महीनों तक हमारी और आपकी मुलाकात नहीं होने वाली है। पिछले दो सालों में मुझसे जो थोड़ा बहुत काम हुआ है, उसमें अगर हजारों सज्जनों का साथ नहीं होता, तो मुझ अकेले से कुछ भी नहीं बन पाता। मैंने जो कुछ काम किया है, उसमें से मुंबई विधानपरिषद के मेरे मित्र डॉ. सोलंकी ने काफी सहायता की है। 1926 में गवर्नर ने मुझे बुला कर पूछा, कि अगर अस्पृश्य समाज की ओर से डॉ. सोलंकी को चुना जाए तो उनके साथ परिषद के काम करने में आपको कोई दिक्कतें तो नहीं आएंगी? इस पर मैंने जवाब दिया था कि, सोलंकी काफी पढ़े-लिखे इंसान हैं