34. देश के स्वराज का मैं समर्थन करता हूं - अक्तूबर 1930 मुंबई - Page 242

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इसलिए परिषद के काम करने में हमारी अच्छी बनेगी। मैं थोड़ा गुस्सैल और ढीठ हूं। परिषद में काम करते समय डॉ. सोलंकी के साथ मेरे बर्ताव में कभी ये दोष व्यक्त भी हुए होंगे। लेकिन डॉ. सोलंकी ने किसी बात को मन से नहीं लगाया और पूरे मनोयोग से मदद की। इसीलिए कौंसिल के काम का सारा श्रेय डॉ. सोलंकी को जाता है। परिषद के बाहर के कामों में समता संघ ने मेरी बहुत मदद की। श्री देवराव नाईक ने आज तक मेरी जितनी मदद की है उससे मैं उन्हें अपना दाहिना हाथ मानता हूं। मुझे यकीन है कि, मैं भले ही 5-6 महीनों तक विदेशों में तब भी हम दोनों के सहकार्य के कारण हममें इतनी आत्मीयता हो गई है कि मेरे पीछे श्री नाईक ही काम कर पाएंगे। समता संघ के मेरे स्नेही श्री प्रधान, कद्रेकर, कवली आदि लोगों ने काफी मदद की है। उसी तरह श्री शंकरराव परशा ने रुपयों के मामले में काफी मदद की है। श्री शंकरराव जैसा मेरा कोई दूसरा आधारस्तंभ था ही नहीं। सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए रुपयों की जरूरत होती है। किन्तु, मैंने पहले-पहल शुरू किए सोलापूर बोर्डिंग के समय मेरे पास हाथ में सिर्फ 500 रुपए ही थे। बाद में एक ज्यू दोस्त को 1000 रुपयों की प्रॉमिसरी नोट लिख कर दी और इस तरह ये बोर्डिंग संस्था शुरू हुई है। इस काम में श्री शंकरराव ने बहुत मदद की। प्रेस

खरीदने के लिए उन्होंने रुपयों 1800 की मदद की।

आज तक अस्पृश्य वर्ग के लिए जो थोड़ी-बहुत सेवा मुझसे बन पाई है, उसका सारा श्रेय अलग-अलग कामों के मेरे सहयोगियों को जाता है। आप जो थैली और मानपत्र दे रहे हैं, उसका मैं स्वीकार करता हूं लेकिन इस थैली की रकम का अपने निजी कामों के लिए बिल्कुल उपयोग नहीं करना है। जिस गरीब समाज की मदद से यह रकम इकट्ठा हुई है उसी गरीब जनता के कामों के लिए इसका उपयोग होना है। अखिल भारतीय दलित काँग्रेस के केंद्रीय संगठन के खर्चे के लिए मुंबई इलाके की ओर से चंदा इकट्ठा कर देने की बात मैंने कबूल की है। इस काम के लिए इस में से थोड़ी रकम डॉ. सोलंकी के पास जमा कर जा रहा हूं। बहिष्कृत काँग्रेस के लिए उन्हें इस रकम का उपयोग करना है। बाकी रकम का इस्तेमाल अलग ढंग से किया जाना है। अपनी बंद हो चुकी पत्रिका ”बहिष्कृत भारत“ का फिर प्रकाशन करने का मन है। वर्तमान हालात का निरीक्षण कर जो बातें सामने आएंगी, वे इस पत्रिका में दी जाएंगी। इसका नाम बदलने का मैंने निश्चय किया है। क्योंकि इस नाम के कारण कई लोग हमारी पत्रिका खरीदने से झिझकते थे, नहीं

खरीदते थे। इससे, हमारी बात सारी जनता तक पहुंचे यह हमारी मंशा पूरी नहीं होती थी। इसीलिए पत्रिका का नाम बदलने का मैंने निश्चय किया है। अब पत्रिका का नाम जनता होगा और उसके संपादन की जिम्मेदारी श्री. देवराव नाईक की होगी। इस पत्रिका के लिए ग्राहक दिलाने की आप कोशिश करें। थैली की रकम