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अपनी अस्पृश्यता का दुख अन्य देशों तक पहुंचना चाहिए। इसीलिए मैं रशिया, जर्मनी, अमेरिका और जापान आदि देशों के प्रमुख नेताओं से मिल कर अपना दुख उनके सामने रखूंगा। इतना ही नहीं, लीग ऑफ नेशन्स के सामने भी अस्पृश्यों की समस्या रखने की मेरी इच्छा है। इसी तरह अस्पृश्यों को फिलहाल पुलिस और सेना की नौकरी पर जो पाबंदी है उसे हटवाने के लिए विशेष कोशिश करूंगा। आप सब लोगों से एक आखरी विनती करना चाहता हूं कि आप सब लोगों को एकता से और मिल-जुल कर रहने की कोशिश करनी चाहिए। हममें आपस में कई गुट पैदा हो गए हैं। पिछले दो-चार सालों में एक बेहद बुरी बात मेरी नजरों में आई है और वह यह है कि हर आदमी खुद को नेता कहलवाना चाहता है और इतराता फिरता है। यह बहुत बुरी बात है। मेरा आपसे अनुरोध है कि आप अबके बाद यह सब बंद करें। हमारे सामने इतनी मुश्किलें हैं, इतने ज्यादा काम पडे़ हैं कि उन्हें करने के लिए एक पूरा जिला या एक पूरा इलाका भी कुछ नहीं कर सकता। इसलिए अखिल बहिष्कृत बंधु अपने आपसी मतभेद भुला कर कंधे से कंधा लगा कर काम पर लग जाएं, इसी में अपना हित है। मेरे पीछे डॉ. सोलंकी और श्री. नाइक के मतानुसार आप चलें और समाज में जागरुकता आई है, उसे बढ़ाने की जिम्मेदारी अब आप पर सौंप कर मैं आपसे विदा लेता हूं। ख्1, “
डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में ये विचार व्यक्त किए।
सुना गया है कि, सभा खत्म होने के बाद अस्पृश्य लोग वहां से बाहर निकले तब बाहर इकट्ठा कुछ लोगों ने उन पर हमला किया। परेल में अस्पृश्य और काँग्रेस पार्टी के लोगों के दरमियान बहुत बड़ी लड़ाई हुई। उसमें पत्थर और लाठियों का इस्तेमाल किया गया। इन दंगों में 8 लोग घायल हुए। उन्हें पास ही के किंग एडवर्ड अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती किया गया। ख्2,
डॉ. भी. रा. अम्बेडकर चरित्र : चां. ग. खैरमोडे, खंड 4, पृष्ठ 66-69
ज्ञानप्रकाश : 4 अक्तूबर, 1930