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जब तक इस देश में अंग्रेज सरकार है, हमारे हाथ में सŸा आना
संभव नहीं
(पहला गोलमेज सम्मेलन 1930 में लंदन में आयोजित किया गया था। इस
परिषद के लिए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को आमंत्रित किया गया था। 20 नवंबर,
1930 के दिन हुए इस पहले गोलमेज सम्मेलन में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा
किया गया पहला भाषण कई मायनों में क्रांतिकारक साबित हुआ। इंग्लैंड के अखबारों
ने उनके भाषण पर विशेष गौर किया। -संपादक)
डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में कहा,
अध्यक्ष महोदय,
मैं और मेरे सहयोगी रावबाहदुर श्रीनिवासन दलित वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में
यहां उपस्थित हुए हैं। भारतीय संविधान के नवीनीकरण के बारे में सोचते हुए यहां
सिद्धांततः मैं दलित वर्ग का दृष्टिकोण ध्यान में रखते हुए बोलने के लिए खड़ा हुआ
हूं। इस वर्ग का प्रतिनिधित्व करना मेरे और मेरे सहयोगी के लिए सम्मान की बात
है। यह दृष्टिकोण चार करोड़ तीस लाख लोगों का अथवा अंग्रेजों के शासन वाले
भारत के एक पंचमांश लोगों का नजरिया है। यह दलित लोगों का वर्ग है और
मुसलमानों के वर्ग से वह स्पष्ट रूप से अलग वर्ग है। हिंदू समाज के साथ उसे
जोड़ कर भला ही देखा जाता हो, लेकिन किसी भी मायने में वह उस समाज का
अभिन्न अंग नहीं है। दलित वर्ग का अलग अस्तित्व है, इतना ही नहीं तो हिंदुओं ने
द्वेष भावना के कारण उनका एक अलग सामाजिक दर्जा तय किया हुआ है, जो हिंदू
समाज की किसी भी अन्य जाति से बिल्कुल अलग है। हिंदू धर्म में कुछ जातियां
ऐसी भी हैं, जिन्हें दोयम या निचला दर्जा प्राप्त है, परंतु दलित वर्ग का दर्जा सबसे
अलग है। उसे भूदास और गुलाम के बीच का दर्जा प्राप्त है। भूदास और गुलामों
पर स्पर्श की पाबंदी नहीं लगाई गई थी। किन्तु दलितों के स्पर्श पर पाबंदियां हैं।
इसलिए गुलाम और भूदासों से भी दलितों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। इस कारण
अगर कोई भयंकर बात हुई हो तो वह यह कि उन पर गुलामी लाद दी गई। उनके
मानवी क्रियाकलापों पर सीमाएं तान दी गईं। ऐसा नहीं कि केवल उनके सार्वजनिक
जीवन पर ही अस्पृश्यता के इस ठप्पे का असर होता है, समानता के मौके मिलने
से भी उन्हें वंचित किया जाता है और मानव का अस्तित्व ही जिस पर आधारित है
उन मूलभूत नागरी अधिकारों से उन्हें वंचित किया गया। इंग्लैंड या फ्रांस की सम्पूर्ण
जनसंख्या जितनी जिस वर्ग की जनसंख्या है, वे जीवन-कलह में इतने संकटों,