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सहूलियतें उपलब्ध करा देते हैं। लेकिन इनमें से किसी भी कुव्यवस्था, रीति-रिवाजों के बारे में कुछ करने की पहल सरकार की नहीं, यह बडे़ दुःख की बात है। सरकार क्यों नहीं कुछ करती? जो करना चाहें वह करने के लिए क्या उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं हैं? ऐसा बिल्कुल नहीं है। सामाजिक और आर्थिक जीवन के प्रचलित ढर्रे को उन्होंने केवल इसलिए छोड़ना, उसे धक्का लगाना, इसमें बदलाव करना उचित नहीं समझा क्योंकि उन्हें डर था कि हितसंबंधी वर्ग द्वारा इसका तीव्र विरोध किया जाएगा। ऐसी सरकार से किसका और क्या कल्याण होगा? इन दो बातों से अपाहिज सरकार से बस यही उम्मीद की जा सकती है, कि भारत की सामाजिक स्थितियां पहले जैसी ही बनी रहें। हम ऐसी सरकार चाहते हैं, जिसके सŸाधारी देश के सर्वोच्च हित के बारे में प्रतिबद्ध हों। प्रचलित सामाजिक और आर्थिक रीति-रिवाजों में सुधार लाने की कोशिश की जाए तो लोगों में आज्ञापालन की प्रवृŸा कब नष्ट होगी और कब विद्रोह करने की प्रवृŸा जोर मारेगी, इन दो बातों के बीच की सीमारेखा को भांपनेवाली और निडरता से सुधारों को लागू करने वाली सरकार हम चाहते हैं। क्योंकि ऐसी ही जगह न्यायप्रियता और उपयुक्तता की परख होती है। अंग्रेज सरकार कभी भी इन कर्त्तव्यों को निभाने की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकती। ये कार्य सिर्फ लोगों की, लोगों द्वारा और लोगों के लिए चलाई जाने वाली सरकार के जरिए ही हो सकता है।
दलित वर्ग द्वारा अपने दृष्टिकोण से उपस्थित किए गए कुछ सवाल और उनके संभाव्य जवाब इस प्रकार हैं। इसीलिए हम ऐसे नतीजों पर आ पहुंचे हैं कि हमारी आज की विशिष्ट संकटपूर्ण स्थिति में बदलाव लाने के सोच से आपके उद्देश्य अच्छे हो सकते हैं लेकिन आज की नौकरशाही भारत सरकार पूरी तरह सामर्थ्यहीन है। हमारे दुःख दूर करने का सामर्थ्य किसी में नहीं है, इसका हमें यकीन हो चुका है। केवल हम ही अपने दुःख दूर कर सकते हैं। और जब तक हमारे हाथ में राजनीतिक सŸा नहीं आती, तब तक हम अपने दुखों को समाप्त नहीं कर सकते। अंग्रेज सरकार जब तक इस देश में है, तब तक राजनीतिक सŸा का बूंद भी हमारे हाथ में नहीं आ सकता। केवल स्वराज्य के संविधान के द्वारा ही राजनीतिक सŸा हमारे हाथ में आने की संभावनाओं का निर्माण संभव है। इसके अलावा हमारे लोगों की मुक्ति किसी और रास्ते संभव नहीं लगती है।
अध्यक्ष महोदय, एक और बात की ओर मैं आपका विशेष ध्यान दिलाना चाहता हूं। दलित वर्ग का नजरिया आपके सामने स्पष्ट करते हुए मैंने अब तक कभी ‘स्वयंसŸात्मक दर्जे का राज्य’ ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया है। इस शब्द का गर्भितार्थ न जानने की वजह से या भारत को स्वसŸात्मक राज्य का दर्जा प्राप्त होने के लिए दलितों का विरोध है इसलिए मैं इस शब्द के प्रयोग करने से बचता