232 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
रहा ऐसी बात नहीं है। इस शब्द का प्रयोग मैं केवल इसलिए नहीं कर रहा, क्योंकि इस शब्द के जरिए दलित वर्ग की भूमिका पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो रही है। दलित वर्ग के लिए सुरक्षा का प्रबंध वाले स्वसŸात्मक दर्जे का राज्य दलित भी चाहते हैं। हालांकि वे मुख्य रूप से एक मुद्दे पर जोर देना चाहते हैं। वे जानना चाहते हैं कि स्वसŸातमक दर्जे वाले भारत सरकार का कामकाज किन तत्वों के आधार से चलने वाला है? राजनीतिक सŸा का केंद्र कहां होगा? वह किसके हाथ में रहेगा? क्या दलित भी उसका वारिस होगा? इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आवश्यक नए संविधान की राजनीतिक व्यवस्था जब तक हाथ में नहीं होती तब तक दलितों को संदेह है, कि उन्हें राजनीतिक सŸा का अल्पांश भी नहीं मिलेगा। इस व्यवस्था का निर्माण करते हुए भारतीय सामाजिक जीवन के कुछ कठोर सत्यों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। भारतीय समाज विभिन्न जातियों की श्रेणियों से बना हुआ है। इस समाज रचना में एक व्यवस्था पनपी है, जिसके तहत बढ़ती श्रेणी के आधार पर सम्मान और उतरती श्रेणी के आधार पर अवमान की जातिगत श्रेणी भी निर्माण हुई है। समता और बंधुभाव जनतंत्र प्रशासन के अत्यावश्यक अंग होते हैं जिन्हें पनपने का अवसर यह समाज रचना कतई नहीं देती। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि, हमें यह बात भी मान ही लेनी चाहिए कि बुद्धिमान प्रबुद्ध वर्ग को भारतीय समाज में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। लेकिन यह वर्ग केवल श्रेष्ठ श्रेणियों से ही बना है। यह वर्ग भले ही देश के बारे में बोल रहा हो और राजनीतिक आंदोलन का नेतृत्व कर रहा हो, किन्तु जिन जातियों में वह पैदा हुआ, उन जातियों के बारे में संकीर्ण दृष्टिकोण को उसने नहीं त्यागा है। दूसरे शब्दों में कहना हो तो समाज की मानसिकता और राजनीति की बनावट में आपसी संबंध होना चाहिए। और दलितों का आग्रह है कि उस व्यवस्था को चाहिए कि वह सामाजिक मानसिकता के बारे में गौर करे। ऐसा न हो तो आप जो योजना बनाएंगे वह केवल अग्रकेंद्रित होने के कारण जिस समाज के लिए वह तैयार की जाएगी उसे ही अयोग्य साबित होगी।
अपना भाषण पूरा करने से पहले मैं एक और बात का विवेचन करना चाहता हूं। हमें बार-बार यह बताया जाता है कि दलित वर्ग का मसला असल में सामाजिक मसला है और उसे हल करने का उपाय राजनीति से अलग है। हम इस विचार का पुरजोर विरोध करते हैं। इस बारे में हमारी पक्की राय है कि जब तक दलित वर्ग के हाथ में राज्य शासन के सूत्र नहीं आएंगे, तब तक उनके प्रश्नों का निराकरण होना कभी भी संभव नहीं है। अर्थात्, दलितों का प्रश्न राजनीतिक हो तो उसे हल भी उसी तरह किया जाना चाहिए। इसीलिए, मैं इस समस्या को राजनीतिक मुद्दा मान कर प्रस्तुत कर रहा हूं। राजनीतिक समस्या के तौर पर ही उस पर विचार होना चाहिए। जिन लोगों की हम पर भयावह आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक हुकूमत