35. जब तक इस देश में अंग्रेज सरकार है, हमारे हाथ में सत्ता आना संभव नहीं - नवंबर 1930 लंदन - Page 250

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है, उन्हीं लोगों के हाथों में राजनीतिक सŸा का हस्तांतरण हो रहा है, इसका हमें अहसास है। असल में स्वराज्य शब्द के साथ हमारे मन में वे सारी यादें मंडराती हैं, जब हम अन्याय, अत्याचार के शिकार हुए थे, हमारा दमन हुआ था और हमारे मन में डर पैदा होता है कि भावी स्वराज्य में उसकी पुनरावृत्ति होगी। इसके बावजूद हमें लगता है कि आजादी मिलनी चाहिए। हमारे देशबंधुओं के साथ हमें भी राज्य की सŸा में बराबरी का हिस्सा मिलेगा इसी उम्मीद के साथ इस गंभीर और अनिवार्य जोखिम को उठाने के लिए हम तैयार हैं। बल्कि ऐसा जोखिम उठाने का साहस हम कर रहे हैं। हालांकि इसे हम एक ही शर्त पर मंजूरी दे सकते हैं कि हमारी समस्या केवल समय की मर्जी पर न छोड़ी जाए बदलते समय के अनुसार कुछ चमत्कार हो जाएंगे, इस भोली आश के सहारे हम सालों से इंतजार में बैठे हुए हैं। आज मुझे इसी बात से डर लगता है। प्रातिनिधिक सरकार को विशेष अधिकार देने की प्रक्रिया के दौरान ब्रिटिश सरकार ने हर कदम पर हमें दरकिनार किया है। राज्य की सरकार में हमारा भी हिस्सा है, यह विचार किसी के मन में ही नहीं आया है। आज मैं अपनी पूरी ताकत समेट कर, जोर दे कर बोल रहा हूं कि इसके बाद कोई हमारी सहनशीलता को आजमाएं नहीं। सभी राजनीतिक प्रश्नों के साथ ही हमारी समस्याओं को भी हल किया जाना चाहिए। किसी भी हाल में आगामी अस्थिर राज्यकŸार्ओं के भरोसे, उनकी सहानुभूति और दया के सहारे नहीं छोड़ देना चाहिए। दलित वर्ग इस बात पर इतना जोर क्यों देता है इसका कारण साफ है। हमारे इस आग्रह के पीछे के कारणों का विश्लेषण भी साफ है। एक व्यावहारिक सत्य सब जानते हैं कि स्वामित्वविहीन व्यक्ति की तुलना में स्वामित्व प्राप्त व्यक्ति हमेशा शक्तिशाली होता है। साथ में यह भी कहीं दिखाई नहीं देता कि स्वामित्वविहीन के लिए स्वामित्व प्राप्त व्यक्ति अपना स्वामित्व छोड़ दे। इसीलिए, हमारी सामाजिक समस्या आगे चल कर हमारे हित साध्य होने से हल होगी, ऐसी आशा हम कर ही नहीं सकते। आज इस सवाल को सर्वसहमति से हल किए बगैर यदि हम उनके हाथों में सहजता से सŸा को जाने देते हैं, तो आज जिन्हें हम सŸा में लाने के लिए मदद करेंगे, कल उन्हीं को सŸा से नीचे खींचने के लिए हमें एक बार और विद्रोह करना पडे़गा, क्रांति लानी पडे़गी। हमारे इस अतिरिक्त संदेह के लिए अगर कोई हमें दोष देना चाहे तो बेशक दे क्योंकि प्रचंड विश्वास के कारण हामी भर कर ध्वस्त होने की तुलना में धिक्कारा जाना बेहतर ही होगा। इसीलिए कहता हूं कि हमारे मसलों को हल करने के लिए सŸा में हमारी भी भागीदारी, हमारा हक हो, यही एक न्याय और सही मार्ग है, ऐसा मुझे लगता है। शासकीय प्रणाली में इस तरह की व्यवस्था करना ही सबसे बढि़या तरीका है, ऐसा मुझे लगता है। इस सŸा को अनियंत्रित तरीके से केवल अपने ही हाथों में लेने के लिए जो लोग जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं उनकी मर्जी पर इस मसले को छोड़ देने से इसका हल नहीं निकलने वाला।