2. उन्नति में बाधक बनने वालों का निषेध - जून, 1920 नागपुर - Page 26

9

Col1 Col2
D yk
Col1 Col2 Col3
foj Col2 j¨èkh
¨èk
Lr ko

अण्णासाहब शिंदे को पहले ही यह पता चल गया था कि सम्मेलन में डिप्रेस्ड क्लास मिशन संस्था और उसके संचालकों के विरोध में प्रस्ताव पारित होने वाला है, इसलिए उन्होंने श्री ग. आ. गवई के पास खासतौर पर लोगों को भेजकर कहलवाया कि मैं आपके वर्होड प्रांत के 50 (पचास) बच्चों को मेरे बोर्डिंग में लेता हूं लेकिन आप लोग डॉ. अम्बेडकर और शिवतरकर के द्वारा हमारी संस्था के विरोध में लाए जा रहे प्रस्ताव को नामंजूर कराएं। इस आदेश का पालन करने के लिए श्री गवई और बेलगांव के पापण्णा ने अपनी तरफ से जबरदस्त तैयारी की थी। हमारे नागपुर जाते समय डी.सी मिशन के संचालकों द्वारा अस्पृश्यों के हितों के खिलाफ जो बयान सरकार को भेजा था उसकी खबर टाईम्स में छपी थी। उसकी एक कापी हमने दो रुपये खर्च करके हासिल की थी क्यों कि वह अंक दो साल पुराना था। सम्मेलन की पहले दिन की कार्यवाही खत्म होने के बाद विषय निर्धारक समिति की बैठक हुई। उसमें कुछ प्रस्ताव पारित होने के बाद डॉ. अम्बेडकर ने अध्यक्ष की अनुमति से यह कहा-

”हम सभी यहां बहिष्कृत वर्ग की उन्नति कैसे हो इस मुद्दे पर विचार करने के लिए एकत्रित हुए हैं। यदि कोई हमारी उन्नति में बाधक बन रहा हो वह फिर चाहे बहिष्कृत वर्ग का हो या उच्चवर्णीय हिन्दू या कोई संस्था हो यदि वह हमारे हितों के खिलाफ काम कर रही हो या जिसने पहले खिलाफ काम किया हो उसका विरोध हमें करना चाहिए या नहीं।“ यह सुनते ही सभी प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा - ”हमारी प्रगति के रास्ते में आने वाले व्यक्ति या संस्था का विरोध किया जाना चहिए। ”क्या यह बात आप सभी को स्वीकार है“ यह सवाल डॉ. अम्बेडकर ने प्रतिनिधियों से तीन-तीन बार पूछा। इसके बाद उन्होंने शिवतरकर से टाईम्स अखबार की प्रति मंगवाई और उसमें से डिप्रेस्ड क्लास मिशन संस्था द्वारा सरकार को भेजे गए बयान को पढ़कर सुनाया। उसका ऐसा असर हुआ कि गवई और उनके सहयोगियों के हौसले पस्त हो गए। बाद में आम राय से प्रस्ताव पारित किया गया। वह प्रस्ताव इस प्रकार है-

तीसरा प्रस्ताव- बहिष्कृत वर्ग की उन्नति के लिए स्थापित हुए डिप्रेस्ड क्लास मिशन ने बयान दिया था कि संशोधित काउंसिल में बहिष्कृत वर्ग के जो प्रतिनिधि लिए जाने वाले हैं उन्हें सरकारी नियुक्ति या जाति पर आधारित संस्थाओं से न लिया जाए वरन उन्हें गैर बहिष्कृतों द्वारा काउसिंल के लिए चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा नियुक्त किया जाए, इससे सारा अस्पृश्य वर्ग चिंतित है। यदि गैर बहिष्कृत प्रतिनिधियों को बहिष्कृत वर्ग के प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया गया तो जिस चातुर्वण्य व्यवस्था से बहिष्कृत वर्ग का दुर्भाग्य पैदा हुआ है उस चातुर्वण्य व्यवस्था