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कारण ही भारत में एकराष्ट्र का भाव पनपा है। लेकिन अभी वह पूर्णावस्था तक नहीं पहुंची है। इसीलिए, आज की राष्ट्र निर्मिति की प्राथमिक स्थिति में इस एक केंद्रीय शासनपद्धति को हटाना मुझे अमान्य है। क्योंकि, भारत अभी भी पूरी तरह एक संघ राष्ट्र नहीं बना है।
तथापि, जिस तरह से इस सवाल को पेश किया गया है, उसे गौर से देखें तो यह केवल किताबी सवाल महसूस होता है। इसीलिए प्रांत की सरकारें अगर केंद्रीय सरकार के साथ विसंगत नहीं चलने वाली हों, तो संघ शासनपद्धति के बारे में भी सोचने के लिए मैं तैयार हूं।
अध्यक्ष महोदय, दलितों के प्रतिनिधि के तौर पर उनकी तरफ से जो भी कुछ मैं कहना चाहता था, वह सब मैंने आपके सामने रखा है। आज एक भारतीय के नाते हमें किन स्थितियों से मुकाबला करना पड़ता है, इस बारे में दो शब्द कहने की इजाज़त मिले तो मैं कुछ कहना चाहूंगा। राष्ट्रीय आंदोलन का मूक प्रेक्षक ना होने पर भी अब तक इस विषय पर जो गंभीर राय सामने रखी गईं हैं उनके बारे में मैं अलग से भाष्य नहीं करना चाहता। हमारी समस्या का हल निकलने के दृष्टिकोण से क्या हम सही रास्ते पर चल रहे हैं अथवा नहीं, इस बात को लेकर मैं चिंतित हूं। इन उपायों का स्वरूप क्या हो यह तय करना अंग्रेजों के प्रतिनिधियों के दृष्टिकोण पर निर्भर है। मैं उन्हें इतना ही कहना चाहता हूं कि इन स्थितियों से राह निकालने के लिए सुलह का रास्ता अपनाना है या दमन का इसका निर्णय उन्हें करना है। क्योंकि निर्णय भले कोई भी हो, अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की होगी। आपमें से जिनका बलप्रयोग में विश्वास है उन्हें राजनीतिक दर्शन के एक महान शिक्षक एडमंड बर्क के एक चिरस्मरणीय वाक्य की याद दिलाना चाहता हूं। अमेरिका के उपनिवेश की समस्याओं के बारे में विचार कर उन्होंने अंग्रेजों के राष्ट्र को उद्देश्य कर कहा,
“बल का प्रयोग (उपयोग) केवल क्षणिक होता है। कुछ समय के लिए उसके सहारे सŸा चलाई जा सकती है। लेकिन उन्हें हमेशा अपने अधीन रखने के लिए बल का प्रयोग करने की आवश्यकता बढ़ाने के लिए दूर नहीं कर सकते। जिस राष्ट्र को हमेशा अपने शासन में रखना हो उस पर इस प्रकार शासन नहीं किया जा सकता।“
मेरी दूसरी आपत्ति है, बल की परिणामकारकता की अनिश्चितता के संदर्भ में। बल के प्रयोग से हमेशा दहशत कायम रहेगी, ऐसा नहीं है और सुसज्ज सेना का मतलब विजय नहीं होता। आपको अगर सफलता नहीं मिली, तो फिर कोई भी मार्ग नहीं बचता। बातचीत से हल न निकले तो बल का ही प्रयोग करना पड़ता है। बल के प्रयोग से हर बार दहशत पैदा हो यह जरूरी नहीं। लेकिन बल का प्रयोग भी