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मुसलमान, उदारवादियों के प्रतिनिधियों से उनके पक्ष के लोगों ने विदाई समारोह में उन्हें फलां-फलां तरह की जिम्मेदारी निभाने के लिए कहा था, लेकिन आप लोगों ने मुझे विदा करते समय सम्मेलन में जो काम करने थे उनकी जिम्मेदारी पूरी तरह मुझ पर सौंप दी। अपनी उन्नति का मार्ग ढूंढने की जिम्मेदारी आपने मुझ पर ही लाद दी। सम्मेलन में गए अन्य प्रतिनिधियों में और मुझ में यह बड़ा फर्क था। सम्मेलन में मैं जो रास्ता ढूंढ कर निकालूंगा, वह मेरी तरह आपको भी पसंद आएगा, इस बारे में मुझे शक था। महत्प्रयासों के साथ जो मार्ग ढूंढ निकाला उसका, मैं संक्षेप में यहां वर्णन करता हूं। रा. ब. श्रीनिवासन के सहयोग से मैंने जो योजना सम्मेलन में प्रस्तुत की उसमें हमने आठ शर्तों की मांग रखी है जो इस प्रकार हैं - समान अधिकारों वाली नागरिकता। हिंदुस्तान को स्वराज मिलना चाहिए अथवा नहीं? स्वराज यदि प्राप्त होता है, तो वह किस प्रकार का हो? स्वराज किसी भी तरह का हो, लेकिन उसमें अस्पृश्य जनता को समान हक से रहने का अधिकार मिलना चाहिए। हमारे लिए उस स्वराज में अगर कोई जगह नहीं है तो वह स्वराज 100 प्रतिशत पूर्णरूपेण हो, तब भी हमें नहीं चाहिए। साथ ही, एक और बात स्पष्ट है कि, अगर हिंदुस्तान की स्वराज की स्थापना हो तो सŸा उच्च वर्ग के हाथों में जाएगी। इसलिए, उच्च वर्ग के हाथ में राजनीतिक सŸा जाने से पहले हमारी अस्पृश्यता अगर कानूनन दूर की जानी चाहिए, तभी हम उसको स्वीकार करेंगे।
कानूनन अगर अस्पृश्यता निवारण की धारा बना भी ली जाए तो भी सभी वर्ग के लोग समान अधिकार से रहेंगे, यह तय करना जरूरी था। अस्पृश्यों को यदि कोई पैरों के नीचे कुचलने की कोशिश करता है, तो उसे राजनीतिक अपराध करार दिया जाना चाहिए। इस मांग के बारे में केवल मुख्य प्रधान मिस्टर रॅम्से मैकडोनल्ड का आश्वासन मिला है। आगे कमेटी में होने वाले विचार-विमर्श में इस मामले में निर्णय होगा।
कुछ भी हो जाए, और हमें जितने चाहे राजनीतिक अधिकार मिल जाएं, फिर भी अस्पृश्य वर्ग को यह डर लगता है कि अगली योजनाओं में उनके बारे में कानूनन या कार्यकारीमंडल के आदेश से भेदभाव पूर्ण व्यवहार होगा। इसीलिए, विधिमंडल या कार्यकारीमंडल ऐसा कोई भेदभाव कर ही न सकें, जिससे कि द्वेष या क्षोभ पैदा हो, ऐसी कोई व्यवस्था की जानी चाहिए और जब तक ऐसी व्यवस्था नहीं की जाती तब तक बहुसंख्यक लोगों के शासन में रहने की बात मानना अस्पृश्य समाज के लिए संभव नहीं है। अगले विधिमंडल में हम अल्पसंख्यक ही रहने वाले हैं। सौ में से 10-15 प्रतिनिधियों का अनुपात बहुत कम है। विधिमंडलों को विभिन्न जातियों में भेदभाव करते हुए कानून बनाने का मौका नहीं मिलना चाहिए। केवल ऐसी नीति ही अपनाएं, जिससे मानवता के हक प्राप्त हों, और यह मांग सम्मेलन में मान ली गई।