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सभा में यहां उपस्थित नहीं हैं। मुझे याद है कि, मैं जब मराठी चौथी की कक्षा में पढ़ रहा था, तब, पुणे में श्री शिवबा जानबा कांबले, थोरात, रामचंद्रराव कदम आदि लोग अस्पृश्यों से संबंधित काम कर रहे हैं, ऐसा मेरे पिताजी मुझसे कहा करते थे। उनमें से श्री. थोरात आज यहां प्रत्यक्ष उपस्थित हैं। श्री कांबले और श्री कदम आज की सभा में आ नहीं पाए। इस तरह के पुराने और वरिष्ठ नेताओं के रहते हुए आज की सभा का अध्यक्ष स्थान का सम्मान मुझे केवल आपके अति आग्रह के कारण ही लेना पड़ रहा है। खैर। अब हाल की स्थितियों में हमें क्या करना चाहिए। इस बारे में पहले सोचना होगा। हम भले अस्पृश्य माने गए हैं लेकिन आखिर हम भी इंसान हैं। समाज के अन्य लोगों की तरह ही हमें भी सम्मान के साथ, समान दर्जे के साथ जीना आना चाहिए। हम मान-सम्मान के योग्य हैं, फिर भी समाज ने हमारे अज्ञान का फायदा उठा कर हमें बहिष्कृत करार दिया है। इस देश को काबीज करने के लिए जिन वीरों की सहायता लेनी पड़ी वे सभी लड़ाकू वीर हमारे समाज के थे। महार सैनिकों के बल पर अंग्रेज यहां अपना साम्राज्य स्थापन कर पाए, उसे स्थिरता दे पाए। इस बारे में विजयचिह्न के रूप में अंग्रेजों ने कोरेगाव में विजयस्तंभ खड़ा किया और हमारे समाज के वीरों की स्मृति को अमर कर दिया है। लेकिन उस समय का अपना दर्जा आज कहीं दिखाई नहीं देता। महारों के पराक्रम, वीरता से अंग्रेजों को राज्य तो मिला, लेकिन देश के उच्चवर्णीय लोगों को खुश करने के लिए तथा महार आदि अस्पृश्य माने गए लोगों का कोई पालनहार, समर्थक न होने के कारण अंग्रेजों ने सेना के वरिष्ठ पदों पर और अन्य महत्त्वपूर्ण पदों पर महारों की भर्ती करने पर पाबंदी लगा दी। आज हालात ऐसे हैं कि लश्कर के महार अधिकारियों के मातहत काम करना कम दर्जे का मानने वाले लोग मुसलमान अधिकारियों के मातहत काम करने में किसी तरह की दिक्कत महसूस नहीं करते। यही बात पुलिस विभाग के बारे में भी है। लेकिन पिछले पांच-छः वर्षों से चल रहे स्वावलंबी आंदोलन के कारण हालात में थोड़ा-बहुत बदलाव आने लगा है। पुलिस विभाग में अपने समाज बन्धुओं को कई सुविधाएं मिलने की बात परसों के सरकारी परिपत्र से सबको पता चल जाएगी। आप सब लोक बस इतना ध्यान में रखें कि हमें अन्य समाजों से कोई बड़ा स्थान प्राप्त नहीं करना है, हमें तो बस इंसानियत पानी है। अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में सोचते हुए हिंदुस्तान (भारत) के अन्य दरिद्र कहलाने वाले लोगों से भी हम अधिक दरिद्र हैं। हमें यह दरिद्रता क्यों प्राप्त हुई, इस बारे में सोचेंगे पर पता चलेगा कि अस्पृश्यता की यह रूढि़ ही इसका एक-मात्र कारण है। इसलिए, जिन उपायों से इंसानियत का अधिकार प्राप्त किया जा सकता है, उन सभी उपायों को हम संगठन के बल पर और निर्भयता से अपनाएं। नासिक, पुणे आदि जगहों पर सत्याग्रह के शस्त्रों को भांज कर अपनी लडाई को सफल बनाने की हिम्मत