40. अस्पृश्यों को आपस में भिड़ाने वाले हितशत्रुओं की कारस्तानी पहचानिए - मई 1931 डिलाइल रोड (मुंबई) - Page 268

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अस्पृश्यों को आपस में भिड़ाने वाले

हितशत्रुओं की कारस्तानी पहचानिए

शुक्रवार, दिनांक 29 मई, 1931 के दिन मुंबई के डिलाइल रोड पर बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर की अध्यक्षता में अस्पृश्य वर्ग की सार्वजनिक सभा आयोजित की गई थी। सभा में कम से कम 5 से 6 हजार लोग इकठ्ठा हुए थे। चार-पांच सौ महिलाएं भी उपस्थित थीं। स्वयंसेवकों के विभिन्न दलों ने सभास्थल पर सही ढंग का प्रबंधन और अनुशासन रखा था। इस अवसर पर डॉ. अम्बेडकर ने करीब घंटे भर तक भाषण दिया। उन्होंने अपने भाषण में कहा,

”आज की सभा का कोई तय कार्यक्रम नहीं है, या सभा का आयोजन करने का कोई खास प्रयोजन ना होने के कारण यहां आना मैं टालने वाला था। लेकिन सभा के आयोजकों ने ऐसा आग्रह किया, इस तरह पीछे पड़े रहे कि मुझे आना ही पड़ा। कोई खास वजह न होने के कारण इतने अधिक लोग इकट्ठा होंगे, इसकी मुझे उम्मीद नहीं थी। यदि मैं नहीं आता तो यहां इकठ्ठा पांच-छह हजार लोगों का दिल टूट जाता। लोगों की आपके बारे में जो राय है, वह कितनी तीव्र, जागृत और जीवंत है, यह जानने के लिए इस तरह की सभाएं, एक तरह से बेहद उपयुक्त साबित होती हैं। सभा का विषय तय नहीं था, इसलिए मुझे क्या बोलना है, यह मैं सोच ही रहा था। हालांकि, नेताओं के एकजुट होने से संबंधित जो प्रस्ताव इस सभा में रखा गया है और जिस पर यहां उपस्थित वक्ताओं ने बोलते हुए अब से पहले जो भाषण दिए हैं, उन्हें सुन कर यहां क्या बोलना समयोचित होगा, इसका मुझे पता चल चुका है। उसी आधार पर मैंने अपना विषय चुना है। अपने अस्पृश्य समाज के जो लोग मुझ पर टीका-टिप्पणी करते रहते हैं, उनकी आलोचनाओं का आज के भाषण में जवाब देने की मैंने ठान ली है। अन्य वर्ग के लोगों और पत्रकारों द्वारा की गई आलोचना, टीका-टिप्पणी का मैं यहां जिक्र नहीं करूंगा। उनकी आलोचना का स्वरूप, कारण और उद्देश्य के बारे में हम में से अनेकों को पता है। उनकी आपिŸायों के बारे में समय-समय पर मैं बोलता रहा हूं। कारण रहेगा या उसके उद्भव होने पर आगे भी मुझे बार-बार यह काम करना होगा। आज मैं सिर्फ अस्पृश्य व्यक्तियों में से कुछ लोगों द्वारा मुझ पर लगाए गए आरोप कैसे खोखले और बेबुनियाद हैं, यह मैं आज यहां बताने जा रहा हूं। अस्पृश्यों की अलग-अलग जातियों के द्वारा मुझ पर दो तरह के आरोप लगाए जाते हैं। चमार आदि अस्पृश्यवर्ग के कुछ लोग कहते हैं कि डॉ. अम्बेडकर की

* जनता : 8 जून, 1931