252 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जाति महार होने के कारण अस्पृश्य वर्ग को जो सहूलियतें मिलनी हैं, उन छूटों और सुविधाओं का सारा का सारा मलीदा वे अपनी महार जाति को ही खिलाने वाले हैं। चमारों को वे उसमें से कुछ मिलने नहीं देते। यह आरोप इतना निराधार और झूठा है, कि पहले तो इसकी तरफ ध्यान देना ही मुझे गैरजरूरी लगा। मेरे साथ मतभेद रखने वाले लोग बाकी समाज में हैं वैसे ही चमारादि अस्पृश्य वर्गों में भी होंगे, यह मैं जानता हूं। हालांकि, कोई भी विचारवान, ईमानदार और जिम्मेदार चमार इस तरह के नीच और झूठे आरोपों से सहमत होगा ऐसा मुझे नहीं लगता। राष्ट्रीय अखबार के पन्नों में जो चटपटा वर्णन पढ़ने में आए, उससे पता चला कि चमारों के भले माने जाने वाले कुछ नेताओं के मुंह से ये आपिŸायां निकली हैं। राष्ट्रीय अखबार की यह खबरें अगर सच हैं तो मुझे इन चमार मंडलियों के बारे में सचमुच बड़ा खेद महसूस होता है। मुझ पर इस तरह के झूठे और निराधार आरोप लगा कर उन्होंने अपना इस हद तक अधःपतन नहीं करवाना था। मेरे बारे में आलोचना करनी ही थी, तो वे कोई और मुद्दा निकाल लाते, या और कोई बहाना ढूंढते। सहूलियतों का चूरमा मैं बस महारों को ही खिलाता हूं और चमार आदि को केवल पत्तों से पोछता हूं, यह मुझ पर लगा आरोप इतना निराधार है कि, इसके झूठ होने का प्रमाण मैं किसी को भी दे सकता हूं।
ठाणे, पुणे, सोलापुर, सातारा आदि जिन जिलों के साथ मेरा निकट परिचय है ऐसे जिलों में भी म्युनिसिपालिटी, लोकल बोर्डस्, स्कूल बोर्ड आदि में जो सदस्य अस्पृश्यों की तरफ से जाते हैं, उन प्रतिनिधियों के बारे में, उनकी जाति के बारे में
खोजबीन की जाए, तो पता चलेगा कि महारों को ही लाभ का सारा चूरमा खिलाने वाला आरोप कितना झूठा, बेबुनियाद, बदमाशीभरा और दुष्टताभरा है, इस बारे में किसी को भी यकीन आ जाएगा। अन्य जिलों की तरह ही ठाणे जिले में भी महारों की जाति बड़ी संख्या में है। इस जाति में लायक लोगों के होने के बावजूद ठाणे म्युनिसिपालिटी में, लोकल बोर्ड में, स्कूल बोर्ड में जो अस्पृश्य सभासद प्रतिनिधि हैं, उनमें एक भी महार जाति का प्रतिनिधि नहीं है। औरों की तुलना में महारों की संख्या अधिक है, उनमें अधिक जागृति भी हुई है। पुणे म्युनिसिपालिटी में भी दोनों चमार जाति के ही प्रतिनिधि हैं। सातारा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड में भी एक भी महार जाति का प्रतिनिधि नहीं है। धारवाड, विजापूर आदि कन्नड इलाके में भी यही हाल है। इस प्रकार स्थानीय संस्थाओं में अस्पृश्यों के प्रतिनिधि के तौर पर केवल महार जाति के लोग ही भरे हुए हैं, यह आरोप पूरी तरह से झूठा और निराधार है। प्रत्यक्ष व्यवहार में पुलिस विभाग अस्पृश्य समाज के लिए बंद ही था। कौंसिल में जाने के बाद इस सवाल को मैं और मेरे सहकारी मित्र डॉ. सोलंकी ने काफी प्रमुखता दी। हमने कोशिश की कि पुलिस विभाग अस्पृश्यों के लिए खुल जाए। उस कोशिश को सफलता मिली और अस्पृश्यों के लिए पुलिस विभाग के दरवाजे खुलने के बारे में सरकारी प्रस्ताव