254 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है और मिल सकती है, यह बात मैं उन्हें अच्छी तरह समझा सकता हूं। लेकिन वे जिसे शिक्षा कहते हैं, वह शिक्षा देने के मामले में भी मेरी कोशिश मेरे ऊपर टीका-टिप्पणी करने वाले इन आलोचकों से बड़े हैं यह मैं शर्त लगा कर कह सकता हूं। मैंने ठाणे, अमदाबाद, धारवाड आदि जगहों में बोर्डिंग चलाए हैं। मेरी कोशिशों के कारण आज 70 छात्र मुफ्त में शिक्षा ले रहे हैं। मेरी आलोचना करने वाले भी इस मामले में अपनी कोशिशों का जायजा लें। शिक्षा के लिए उन्होंने कितना पैसा खर्च किया है, और कितनी मेहनत की है यह वे जनता को बताएं। खुद बिना कुछ किए औरों के बारे में ‘इसने यह नहीं किया, वह करना चाहिए था’ आदि बेकार की ऊंची हांकनी नहीं चाहिए। नासिक जिले में ऐसे आलोचक खासकर मेरे देखने में आए। हालांकि उनकी आलोचना में थोड़ा दम तो जरूर है, लेकिन सातारा जिले के रा. निकालजे आदि महार जाति के ही लोग जो मेरी आलोचना करते हैं, वह बिल्कुल बेसिर-पैर की आलोचना होती है। कुछ खिलाफ करके दिखाना है, बेकार में उल्टा-सीधा बोल कर अपने आपको नेता कहलवाना, यही उनके जीवन का इतिकर्त्तव्य है ऐसा लगता है। अभी कुछ कुछ दिनों पहले निकालजे आदि लोगों ने सातारा जिले की ओर से महार समाज की एक परिषद बुलाई थी। इस परिषद का स्थान पुणे के मुजुमदार, इनामदार साहब को दिया था। ये इनामदार जाति से ही नहीं बल्कि प्रकृति से भी पेशवाई के सच्चे वंशज हैं। पुणे के पर्वती सत्याग्रह का विरोध करने वालों में ये इनामदारसाहब प्रमुख थे। ऐसे व्यक्ति को अध्यक्ष बना कर तथा अस्पृश्यों के आंदोलन के सूत्र एक पराए व्यक्ति के हाथों सौंप कर निकालजे क्या दिखाना चाहते हैं?
स्वावलंबन और स्वाभिमान की बुनियाद पर आज का अस्पृश्य आंदोलन खड़ा है। मुजूमदार साहब जैसे लोगों को अध्यक्ष बना कर इन सिद्धांतों पर निकालजे आदि लोगों ने पानी फेर दिया है। इसके बजाय अगर वे खुद अध्यक्ष बनते, या अपने मतों को मानने वाले अस्पृश्य उपाधिधारक को ही अध्यक्ष बनाते तो लोगों को वह ज्यादा पसंद आता। लेकिन इनामदार साहब को अध्यक्ष बना कर वे खुद भी सभा में नहीं आए और न ही लोग इकट्ठा हुए। मुझ पर एक आरोप यह भी लगाया जाता है कि रा. निकालजे जैसे लोगों के साथ मैं मिल-जुल कर नहीं रहता। लेकिन मैं समझ नहीं पाता कि इनके साथ मिल-जुल कर कैसे रहा जाए? जो सिद्धांत क्या है, यह तक नहीं जानते, न जानने की इच्छा है, जिनके पास स्वाभिमान नहीं है, केवल खुद का महत्व जो बढ़ाना चाहते हैं, उनसे कौन, कहां तक और कैसे मिल-जुल कर रहे? उन्हें कोई कैसे समझाए? ऐसे लोगों को आप जैसे आम लोग ही उनकी सही जगह दिखा सकते हैं। सच्चा और लायक नेता कौन और अपना हित कौन साध्य सकता है, इसका निर्णय अब तो जनता को ही करना होगा। जिन्हें नेता बनना है, वे भी ध्यान में रखें कि केवल ”मुझे नेता कहें“ कहने मात्र से कोई नेता नहीं बन जाता।