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दुनिया में व्याप्त गुलामी की सभी पद्धतियों में
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अस्पृश्यता भयंकर और भीषण है
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर और उनके सचिव श्री. एस. एन. शिवतरकर दिनांक 28 जून, 1931 को अहमदाबाद गए थे। वहां अस्पृश्य छात्रों के लिए स्थापन किए गए छात्रावास का मुआयना करना और वहां कुछ अन्य सुविधाओं का प्रबंध करना था। अहमदाबाद की जनता को डॉ. अम्बेडकर के आने की खबर ऐन समय पर मिलने के बावजूद थोडे़ समय में ही उन्होंने उनके जोरदार स्वागत की सारी तैयारियां पूरी कर ली थीं। हजारों अस्पृश्य लोग डॉ. अम्बेडकर के दर्शन के लिए अहमदाबाद में आए और अहमदाबाद स्टेशन पर इकट्ठा हुए। वहां के स्पृश्यवर्ग के युवा मंडल ने (यूथ लीग) और अस्पृश्यों के अलग-अलग करीब-करीब तीस संस्थाओं ने अपने स्वयंसेवकों को लाकर वहां का ठीक प्रबंधन संभाला हुआ था। अस्पृश्य समाज की यह अपनी मर्जी से, उत्साह के साथ और अपने बलबूते पर की गई तैयारी को देख कर कौतुक और धन्यता का भाव पैदा हो रहा था। लेकिन इस तैयारी को देख कर वहां के गुजरात प्राविंशियल काँग्रेस कमेटी के कुछ सदस्यों के पेट में मत्सर और द्वेश पैदा हुआ। अपना उद्देश्य क्या है, अपने नेता ने किस ध्येय को साध्य करने की दीक्षा अपने लोगों को दी है, आदि बातों के बारे में बिना सोचे वहां के काँग्रेस वाले हाथ में काले झंडे लेकर और मुंह से कुछ गंदे और काँग्रेस की गरिमा को बट्टा लगाने वाले शब्दों का उच्चारण करते हुए डॉ. अम्बेडकर पर शेम-शेम शब्द बरसाने के लिए पहुंच गए। इन उन्मŸा और अविचारी गुंडों ने अस्पृश्यों को गुस्सा दिलाने वाली और उनका अपमान करने वाली हरकतें हुड़दंग मचाकर अफरा-तफरी मचाने का प्रयास किया। उन्हें चुप कराना अस्पृश्य स्वयंसेवकों और जनता के लिए कठिन नहीं था, लेकिन डॉ. अम्बेडकर के पहुंचने का समय करीब आ गया था, उनके सामने किसी तरह का हुड़दंग न मचे, इसलिए उन्होंने शांति और अनुशासन बनाए रखा। इसके बावजूद काँग्रेस के उन लोगों ने धक्कमपेल करते हुए थोड़ी बहुत अफरा-तफरी मचा ही दी।
कुछ समय पहले ही मौ. शौकत अली यहां आए थे तब इन डरपोक लोगों को इस तरह विरोध जताने का साहस नहीं हुआ था। क्योंकि उन्हें पता था कि अस्पृश्यों की तरह मुसलमान लोग शांति से काम नहीं लेंगे। समय आने पर अपने से अधिक गुंडागर्दी कर वे अपनी खोपड़ी तोडें़गे, इसका उन्हें पूरा यकीन था। इसीलिए बडे़
* जनता : 6 जुलाई, 1931