257
भाई के साथ मजाक करने का साहस उन्होंने नहीं दिखाया। अस्पृश्य हैं क्या चीज, अपने पैरों तले के जीव। हम उन्हें जब चाहे मसल देंगे, ऐसा उन्हें लगा होगा और इसीलिए वे उनके प्रिय नेता का बेवजह अपमान करने चले आए थे। अस्पृश्य स्वयंसेवकों ने संयम से काम लिया। गुस्से को दूर रखा उनकी करतूतें गैरकानूनी रूप धारण करने लगीं, तो सरकारी सिपाहियों ने उन्हें वहां से खदेड़ दिया। इसीलिए, स्पृश्य-अस्पृश्यों के बीच मारपीट टल गई। लेकिन इस सारे प्रसंग में किसकी बेइज्जती हुई, जो काँग्रेसी नेता यह कहते फिरते थे कि सरकारी सिपाही गुंडागर्दी करते हैं और गांधी-आयर्विन सुलह भंग करते हैं, क्या ऐसी बकवास करने वाले काँग्रेसी नेताओं की बेइज्जती नहीं हुई इस प्रसंग से?
डॉ. अम्बेडकर के सार्वजनिक सम्मान का और सार्वजनिक भाषण का वहां के युवा मंडल ने जो कार्यक्रम तय किया था उसे बिगा़डने का उनका षड्यंत्रकारी कार्यक्रम कामयाब तो नहीं ही हुआ उल्टे, उनके विघ्नसंतोषी स्वभाव पर लगाम कसने के लिए उम्मीद से कहीं अधिक जनसमुदाय डॉ. अम्बेडकर के सम्मानार्थ तथा उनका भाषण सुनने के लिए वहां इट्ठा हुआ था। काँग्रेस और गांधीजी की राजनीति का संक्षेप में विश्लेषण कर उनमें और अपने में कहां, कैसे और क्यों मतभेद पैदा हो रहा है, इस बारे में संक्षेप में लेकिन सिलसिलेवार विश्लेषण उन्होंने जनता के सामने रखा। अस्पृश्य युवाओं को संबोधित कर उन्होंने कहा,
अपनी लड़ाई सभी तरह की गुलामियों के खिलाफ है। अस्पृश्यता की प्रचलित गुलामी दुनिया में व्याप्त गुलामी की सभी पद्धतियों में भयंकर और भीषण है और अकेले हिंदू समाज के और धर्म के मुंह पर लगी कालिख ही नहीं है, वरन् पूरे मानव धर्म और इंसानियत पर लगा लांछन है। हम हिंदू समाज के अभिन्न अंग हैं। और इसीलिए हिंदुओं की हर धार्मिक संस्था और मंदिरों में प्रवेश करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। आपकी आज की तैयारी और साहस देखकर मुझे बहुत संतोष हुआ। लेकिन मेरी अगली मुलाकात के वक्त मैं चाहता हूं कि आपकी इससे अधिक तैयारी हुई हो। अस्पृश्यता निवारण का जो कार्य आपने स्वीकारा है वह अधिक परिणामकारी होने की मैं उम्मीद रखता हूं।“ डॉ. अम्बेडकर का यह सार्वजनिक भाषण अमदाबाद के प्रेमाभाई हॉल में सम्पन्न हुआ।