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लडाई अगर कांटे की हो तो भी उसे पार लगाने की जिम्मेदारी
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अपनेपन की भावना के साथ निभाए
दिनांक 14 अगस्त, 1931 को बहनों की सभा के बाद 10 बजे तक पगारे बंधू चांदोरीकर के जलसे का कार्यक्रम हुआ। डॉक्टर साहब ने जलसे वालों का अभिनंदन कर उन्हें धन्यवाद दिया और उन्हें एक चांदी का पदक अपने हाथों से अर्पण किया।
पुरुष वर्ग से विदा लेते समय डॉ. अम्बेडकर ने बेहद असरदार भाषण दिया। मन को हिला देने वाला उनका मर्मस्पर्शी भाषण सुन कर सबके मन आगामी युद्ध के लिए उत्सुक हो गए हों, ऐसा लग रहा था। अध्यक्ष डॉ. सोलंकी ने विलायत जा रहे डॉ. अम्बेडकर के काम के बारे में सबको बताया। उसके बाद डॉक्टर साहब बोलने के लिए उठ खड़े हुए। उन्होंने कहा,
हमें आज तक मिली सफलता में डॉ. सोलंकी का भी हिस्सा है, यह बात मैं भूल नहीं सकता। हमारी लड़ाई बड़ी विकट है, और अपने काम में सफलता पाना बहुत कठिन है। गोलमेज सम्मेलन में पूरे हिंदुस्तान से हर पार्टी के, पंथ के, जाति के मिला कर करीब 125 प्रतिनिधि हैं। इन में से केवल दो ही प्रतिनिधि अपने समाज से चुने जाएं, यह बडे़ दुःख की बात है। हम दो एक तरफ और बाकी सब दूसरी तरफ, ऐसी स्थितियों में अगले गोलमेज सम्मेलन में कहां तक सफलता मिलेगी, मैं आज कुछ कह नहीं सकता। पूरी-पूरी कोशिश, भरसक प्रयास करना मैं अपना कर्त्तव्य समझता हूं। आपका मुझ पर जो अलौकिक प्रेम है उसे देख कर मुझमें हर काम करने का उत्साह पैदा होता है। इसी उत्साह के बलबूते पर मैंने अपने काम की नींव रखी है। इसी के बल पर अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई में अधिक से अधिक जीत हासिल करूंगा। लेकिन मेरे लौटने तक डॉ. सोलंकी के नेतृत्व में आपको अपना संगठन और पुख्ता बनाना होगा, उसकी व्यापकता की ओर ध्यान देना होगा।
दूसरी मह़त्त्वपूर्ण बात यह है कि, महात्मा गांधीजी के साथ मेरी जो मुलाकात हुई उसमें मुझे पूरी तरह निराशा ही दिखाई दी। हमारे राजनीतिक अधिकारों के संदर्भ में महात्मा गांधी आज की स्थितियों में कुछ भी नहीं कर सकते। हमारे लिए जितने अपनेपन के साथ उन्हें काम करना चाहिए, उतना करना उनके लिए असंभव है। जनता पत्र में दी गई जानकारी से आपको गांधीजी के साथ हुई मुलाकात के
* जनता : 17 अगस्त, 1931