सात करोड़ अस्पृश्य हिमालय को जमीनदोस्त कर सकते हैं
दिनांक 9 मार्च, 1924 को मुंबई के दामोदर हाल में शाम के चार बजे समाज
सेवकों की बैठक हुई। डॉ. अम्बेडकर ने सुझाव दिया कि संस्था को -बहिष्कृत
हितकारिणी सभा नाम दिया जाए और उसे मंजूर कर लिया गया। उन्होंने तय
किया कि - एजुकेट, एजीटेट एंड आर्गनाइज-(पढ़ो, संघर्ष करो और संगठित
बनो) यानी लोगों को शिक्षित बनाओ, उनमें अपनी दयनीय स्थिति के प्रति आक्रोश
पैदा करो और उनका संगठन बनाओ-यह इस सभा का घोषवाक्य तय किया
गया। उसके बाद 20 जुलाई, 1924 को संस्था की स्थापना की घोषणा की गई।
बहिष्कृत हितकारिणी सभा के सदस्य बनाने का काम जोरदार ढंग से शुरू हुआ।
सदस्यों की संख्या बढ़ने लगी। सभा की सारी जिम्मेदारी शिवतरकर के हाथों
में थी। वे संस्था का काम काफी अच्छी तरह चलाते थे। पहले श्री नारायणराव
स. काजरोलकर, सखारामबुआ ना. काजरोलकर, बालकृष्ण देवरुखकर, शिरसेकर,
चांदोरकर, वनमाली, बालू बाबाजी पालवणकर, बोरघरकर आदि सभी चर्मकार समाज
के लोग भी बाबासाहेब के आफिस में आकर बैठते थे। बाबासाहेब उनसे मुंबई के
अस्पृश्यों के बीच का भेदभाव खत्म करना, लड़कों और लड़कियों के लिए होस्टल
शुरू करना, शादी-व्याह और अन्य कार्यक्रमों के लिए विशाल हाल का निर्माण
करना, प्रेस खरीदकर अखबार शुरू करना आदि कामों की रूपरेखा उनके सामने
रखकर उस पर उनसे चर्चा किया करते थे। ये सब बाबासाहेब के कट्टर प्रशंसक
थे। उनकी नाराजगी थी शिवतरकर को लेकर और उसकी कई निजी वजहें थी।
इसके अलावा शिवतरकर दूसरों से रूढ़ बर्ताव करते थे। इसे लेकर महार समाज के
लोगों में असंतोष रहता था। इस बारे में एक बार आिॅफस में चर्चा हुई तो बाबासाहेब
ने शिवतरकर के विरोधियों से कहा कि, ”शिवतरकर हमेशा मेरे साथ रहते हैं और
संस्था का हर जरूरी काम करते हैं। आप लोग उनका विरोध क्यों करते हैं? मैं हमारे
समाज की प्रगति के लिए ईमानदारी और जुटकर काम करने वाला हूं। उसके लिए
मैंने इतनी पढ़ाई की है। मैं अपनी ज्ञानशक्ति का उपयोग केवल अपने परिवार और
जाति के लिए करने वाला नहीं हूं। मैं सारे अस्पृश्य समाज के लिए उसका उपयोग
करने वाला हूं। इसके लिए मैंने कई योजनाएं बनाईं हैं। यदि वह सफल हुई तो
अस्पृश्य और स्पृश्य समाज दोनों का लाभ होगा। अस्पृश्यों की समस्या बहुत विकट
है। मैं जानता हूं कि मैं उनको पूरी तरह हल नहीं कर सकता लेकिन मुझे विश्वास
है कि उन समस्याओं को दुनिया के सामने लाकर उनकी ओर सारी दुनिया का ध्यान
आकर्षित कर सकता हूं। अस्पृश्यता की समस्या विशाल हिमालय है। इस हिमालय
से टकराकर मैं अपना सिर फोड़ लेने वाला हूं। एक बात आप ध्यान में रखे इससे