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में डॉ अम्बेडकर ने जो अद्वितीय कार्य किया उसके लिए अस्पृश्य समाज उनके लिए धन्यवाद के गीत गा ही रहा था। लेकिन उनमें से हर किसी को यही लग रहा था कि डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के प्रत्यक्ष दर्शन किए बगैर उनके कार्य के बारे में अपने मन में चेतनाशील विचार व्यक्त नहीं होंगे। ”दिनांक 29 जनवरी, 1932 के दिन एस एस मुलतान जहाज से मुंबई आऊंगा“ का तार पहुंचा तो यहां के अस्पृश्य समाज में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। 29 तारीख का हर किसी को बेसब्री से इंतजार था। और आखिर उनके आगमन का दिन बीते शुक्रवार को निकल आया।
सुबह छह बजे डॉ. अम्बेडकर बेलार्ड पियर के मॉल स्टेशन पर उतरने वाले थे। इसके बावजूद अनगिनत अस्पृश्य भाई-बहनों का जमावड़ा तड़के साढ़े चार-पांच बजे से ही मॉल स्टेशन पर इकट्ठा होने लगा था। हर एक के मुख पर खुशी की, एक तरह के संतोष की और संतृप्ति की भावनाएं साफ दिखाई दे रही थीं। आनंद के कारण मुख से सहज ही ‘डॉ. अम्बेडकर की जय’ की घोषणा निकल रही थी। महिलाओं द्वारा की गई इसी घोषणा से बीच-बीच में वातावरण गूंज उठता था। सबको डॉ अम्बेडकर के दर्शन की उत्सुकता थी। और आखिर छह बज गए, सबकी नजरें मुलतान जहाज की राह में बिछी थीं। इतने में डॉ. अम्बेडकर ने जहाज के डेक पर आकर छुटपुट दर्शन दिया और उनकी जयकार से वातावरण गूंज उठा।
पहले से तय था कि डॉ. अम्बेडकर के स्वागत का कार्यक्रम मॉल स्टेशन के एक भव्य हॉल में किया जाएगा। उस हॉल को बढि़या ढंग से सजाया गया था। उसमें एक उच्चासन भी बनाया गया था। डॉ. अम्बेडकर जिस जहाज से आने वाले थे, उसी जहाज से मौ. शौकत अली भी आने वाले थे, जिनके स्वागत की भी मुसलमान बंधुओं ने और खिलाफत के स्वयंसेवकों ने तैयारी की थी। इसी हॉल का आधा हिस्सा मुसलमान बंधुओं को दिया गया था। एक तरफ मुसलमान समाज और दूसरी तरफ अस्पृश्य समाज इस प्रकार हॉल को बांटा गया ता। जिस तरह डॉ. अम्बेडकर के स्वागत के लिए अस्पृश्य लोग उत्सुक थे उसी तरह मौ. शौकत अली के स्वागत के लिए मुसलमान बंधू भी आतुर थे। सात बजे का समय दोनों के स्वागत के लिए तय किया गया था। जहाज पर उनके स्वागत के लिए मुसलमान और अस्पृश्य समाज के नेता गए थे। स्वागत से पहले जहाज के सबसे ऊपर वाले डेक पर गोलमेज सम्मेलन के बारे में डॉ. अम्बेडकर और श्री देवराव नाईक, डॉ. प्रधान, श्री असईकर, कद्रेकर, गुप्ते, प्रधान, खांडके, शिवतरकर, रणखांबे आदि के साथ थोड़ा विचार-विमर्श हुआ। फिर डॉ. अम्बेडकर ने जहाज पर अपना फुटकर काम निपटाया और उसके बाद वे और मौ. शौकत अली स्वागत के लिए तैयार किए गए हॉल में आए। उस वक्त एक बार फिर उनकी जयकार से वहां का वातावरण गूंज उठा। डॉ. अम्बेडकर और मौ. शौकत अली का दोनों समाजों की ओर से स्वागत हुआ ऐसा कहना गलत नहीं होगा।