272 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
देती, तो गोलमेज सम्मेलन में मैं कुछ नहीं कर पाता। आपके अंतःकरण में स्वाभिमान का और स्वतंत्रता का जो दीप जल रहा है, उसे अधिक उज्जल करने की कोशिश की जानी चाहिए ताकि वह फिर कभी बुझ न पाए। आप लोगों को सबसे पहले इसी बात का खयाल रखना होगा।
छह करोड़ अस्पृश्य जनता यदि अपने राजनीतिक अधिकारों के बारे में घोषणा करती है, तो यह अलौकिक है। नेता के पीछे चलने के बजाय यदि जनता खुद निडरता से कमर कस कर खड़ी हो जाए, तो किसी भी कार्य में उसे सफलता मिलनी ही चाहिए। मेरे छह करोड़ अस्पृश्य बंधु अगर हिम्मत से काम लें तो भारत के लोगों को स्वराज मिलने में समय ही कितना लगने वाला है! अपने अंतःकरण में दबी इंसानियन की, अपनत्व की नमी को सूखने ना दें। उसे और अधिक कैसे चमकाया जा सकता है, यह सोचें। कुछ वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों को जो बातें असंभव लगती थीं, वे आज दस वर्षों के अंतराल में ही संभव हो चली हैं। खासकर, पिछले दो सालों में जो जागृति हुई है वह हर तरह सें अपूर्व ही कहलाएगी। कुछ समय पूर्व तक मेरे कार्य में मेरे चमार बंधुओं को विश्वास नहीं था, यह बात बार-बार मेरे मन को कुरेद रही थी। लेकिन आज मैं जिस जहाज से भारत आया, तब मेरे स्वागत के लिए आए आप अन्य जातियों के नेताओं के साथ-साथ अचानक मि. पी. बालु, श्री राजभोज, काजरोलकर, पवार आदि चमार समाज के लोगों को देखकर मेरा मन
खुशी से भर आया। अपने महार समाज के लोगों को देख कर मुझे जितनी खुशी हुई उससे अधिक इन लोगों के प्रेमपूर्वक मिलने से हुई। मैं इंसान हूं, इंसान से गलतियां होना स्वाभाविक हैं। इन बातों को अपनाकर कार्य करते हुए, हो सकता है मेरी ओर से आपके प्रति कुछ पक्षपातपूर्ण व्यवहार हुआ हो और उसका कारण बस इतना ही है कि अपना अस्पृश्य समाज इतना पददलित है कि उनके बारे में जो काम करना है, उसकी व्यापकता बहुत अधिक है। ऐसे में मैं अकेला सबको कैसे संतुष्ट कर सकता हूं? अपना समाज कार्य असल में देखा जाए तो जैसे आकाश की ही परिक्रमा करने जैसा है। खैर, जो भी हो, इसके बावजूद उन्होंने मेरा जो स्वागत किया है, उससे मुझे कल्पनातीत संतुष्टि मिली है। हमारे सार्वजनिक कार्य में उनके राजनीतिक अधि् ाकारों के बारे में मैं उन्हें पूरा यकीन दिलाना चाहता हूं।
महार जाति में यदि मेरा जन्म हुआ भी है, तो भी समग्रता से महारों के लिए ही मैं कभी काम नहीं कर सकता। बल्कि, मैं सोचता हूं कि यदि मेरे समाज को कुछ न मिला तो भी कोई बात नहीं, मैं बाकी लोगों के लिए भी जो चाहे करने के लिए तैयार हूं, कर सकता हूं बशर्ते कि मेरे हर काम में मुझे उनका पूरा-पूरा सहयोग मिले। इस कार्य में अपने समाज की विभिन्न जातियों में एकता होने से आगे के काम एक-दूसरे की सहमति से मिलजुल कर हल करना असंभव नहीं है, ऐसा मुझे लगता